द्रष्टा और दृश्य का भेद कैसे गिराया जाए?
“आप जो चाहते हैं उसे खोजना बंद करें। उसे खोजें जो खोज रहा है।”
जीवन में मनुष्य निरंतर कुछ न कुछ खोजता रहता है। कोई सुख चाहता है, कोई शांति, कोई सफलता और कोई परमात्मा को प्राप्त करना चाहता है। हम अपने प्रश्नों के उत्तर खोजने में जीवन का बहुत बड़ा समय लगा देते हैं। लेकिन एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात अक्सर हमारी दृष्टि से छूट जाती है— जो प्रश्न पूछ रहा है, वह कौन है?
ध्यान सामान्यतः प्रश्न या उत्तर पर केंद्रित रहता है। हम यह जानना चाहते हैं कि सत्य क्या है, आत्मा क्या है और मुक्ति का मार्ग कौन-सा है। लेकिन जिस व्यक्ति के भीतर यह प्रश्न उठ रहा है, उस “जानने वाले” की ओर हमारा ध्यान कम जाता है। जबकि वास्तविक खोज का आरंभ यहीं से होता है।
प्रश्न और उत्तर से अधिक महत्वपूर्ण है प्रश्नकर्ता
आध्यात्मिक दृष्टि से न केवल प्रश्न महत्वपूर्ण है और न केवल उसका उत्तर। सबसे महत्वपूर्ण है वह जो जानना चाहता है। जिस चेतना के भीतर प्रश्न उठता है, जिसके भीतर सत्य को जानने की जिज्ञासा पैदा होती है, उसके तार मूल सत्ता से जुड़े हुए हैं।
मूल रूप से चेतना एक है और अखंड है। उसी एक सत्ता को कोई परमात्मा कहता है, कोई परम शक्ति और कोई शुद्ध चेतना। लेकिन उसी एक सत्ता की लीला में अनेक रूप दिखाई देते हैं। हम सब मूलतः उसी सत्य की अभिव्यक्ति हैं, किंतु अहंकार हमें अपनी वास्तविक पहचान से दूर कर देता है।
अहंकार से भागना नहीं, उसे समझना है
सामान्यतः अहंकार को आध्यात्मिक जीवन का सबसे बड़ा शत्रु माना जाता है। मनुष्य अहंकार को समाप्त करने के लिए संघर्ष करता है और स्वयं से लड़ता रहता है। लेकिन यदि हम वर्तमान में स्वयं को अहंकार के रूप में अनुभव कर रहे हैं, तो उससे भागने का प्रयास हमें कहाँ ले जाएगा?
आत्मस्वीकार का पहला कदम
“हाँ, इस समय मैं अपने अहंरूप को अनुभव कर रहा हूँ।” इस सत्य को स्वीकारते ही आत्मसंघर्ष कम होने लगता है।
सत्य को जानने वाले महात्मा अहंकार को केवल रास्ते का पत्थर नहीं मानते। वे उसी को एक सीढ़ी बना देते हैं। जो अहंकार आज पीड़ा का कारण बन रहा है, वही सजगता के माध्यम से आत्मज्ञान का साधन बन सकता है।
पीड़ा से आत्मविचार की शुरुआत
अहंरूप में हम कभी सुखी होते हैं, कभी दुखी, कभी क्रोधित और कभी चिंतित। हमारी मनःस्थिति बदलती रहती है और उसके साथ हमारा “मैं” भी बदलता हुआ प्रतीत होता है। लेकिन प्रत्येक अनुभव के पीछे एक ऐसा जानने वाला मौजूद है जो इन परिवर्तनों को देख रहा है।
अपने आप से ये प्रश्न पूछिए
- जब दुःख हो रहा है, तो यह दुःख किसे हो रहा है?
- जब सुख का अनुभव हो रहा है, तो सुख को जानने वाला कौन है?
- जब क्रोध आता है, तो क्रोध को देखने वाला कौन है?
- जब भय उत्पन्न होता है, तो भय को जानने वाला कौन है?
- जब पलायन की इच्छा होती है, तो पलायन कौन करना चाहता है?
यही सजगता हमें धीरे-धीरे बाहरी अनुभवों से भीतर की ओर ले जाती है। हमें अपने अनुभव से भागना नहीं है। जो भी स्थिति इस समय मौजूद है, उसे पूरी जागरूकता के साथ देखना है।
द्रष्टा शरीर नहीं, जागरूकता है
आत्मविचार की परंपरा हमें यह समझाती है कि द्रष्टा शरीर नहीं है। शरीर देखा जा सकता है, इसलिए वह दृश्य है। विचार आते और चले जाते हैं, इसलिए वे भी दृश्य हैं। सुख और दुःख बदलते रहते हैं, इसलिए वे भी स्थायी नहीं हैं।
लेकिन इन सबको जानने वाला कौन है? द्रष्टा जागरूकता है। द्रष्टा जानने की शक्ति है।
हमारे भीतर एक ऐसी चेतना है जो जानती है कि विचार उत्पन्न हो रहे हैं, भावनाएँ बदल रही हैं और शरीर में परिवर्तन हो रहे हैं। समस्या तब शुरू होती है जब हम स्वयं को केवल शरीर और विचारों के साथ जोड़ लेते हैं।
तब विचार इतने प्रभावशाली हो जाते हैं कि ऐसा लगता है कि हम विचार कर रहे हैं। लेकिन कई बार स्थिति इसके विपरीत होती है— विचार हमें सोच रहे होते हैं।
जल और काई का आध्यात्मिक उदाहरण
जल हमारा स्वरूप है, काई अहंकार का आवरण
जल का वास्तविक स्वरूप काई नहीं है, लेकिन जब काई जल की सतह पर फैल जाती है, तो जल ढक जाता है। इसी प्रकार हमारा वास्तविक स्वरूप शुद्ध चेतना है, लेकिन विचार और अहंकार उसके ऊपर आवरण की तरह दिखाई देते हैं।
यदि जल काई से लड़ने लगे, तो संभव है कि काई फिर से फैल जाए। इसी प्रकार अहंकार के साथ निरंतर युद्ध करने पर वह नए रूपों में सामने आ सकता है।
इसलिए पहला कदम संघर्ष नहीं, बल्कि सजग स्वीकार है। जब हम स्वीकारते हैं कि वर्तमान अनुभव में अहंकार मौजूद है, तब उससे लड़ने की आवश्यकता कम होने लगती है।
स्वीकार से शांति और शांति से गहराई
जब हम स्वयं को स्वीकारते हैं, तो अपने भीतर चल रहा संघर्ष कम होने लगता है। हमें स्वयं से भागना नहीं पड़ता और न ही स्वयं को जबरदस्ती बदलने की आवश्यकता होती है।
आत्मस्वीकार के बाद भीतर शांति उत्पन्न होती है। और जब मन शांत होता है, तब आत्मविचार की गहराई में उतरना संभव होता है। धीरे-धीरे शरीर की सीमित पहचान पीछे छूटने लगती है और जागरूकता का अनुभव स्पष्ट होने लगता है।
समर्पण और परम शक्ति का अनुभव
आत्मस्वीकार केवल मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया नहीं है, यह समर्पण का मार्ग भी है। जब हम अपने अहंरूप को परम सत्य मानना छोड़ देते हैं, तब हमारे भीतर व्यापक सत्ता के प्रति समर्पण उत्पन्न होने लगता है।
परम शक्ति है, परमात्मा है, और जीवन एक व्यापक व्यवस्था के अंतर्गत चल रहा है। मनुष्य जब स्वयं को इस व्यवस्था से ऊपर मानने लगता है, तब संघर्ष उत्पन्न होता है। लेकिन जब वह जीवन की व्यापक व्यवस्था के साथ चलना सीखता है, तब उसके भीतर संतुलन और शांति का अनुभव बढ़ता है।
यदि हम दूसरों का भला करने का प्रयास करें और किसी के प्रति बुरा न सोचें, तो हम उस सकारात्मक व्यवस्था का हिस्सा बनते हैं जो जीवन में सद्भाव और करुणा को बढ़ाती है।
द्रष्टा और दृश्य का भेद तब गिरने लगता है जब हमारा ध्यान केवल दिखाई देने वाली वस्तुओं, विचारों और अनुभवों से हटकर उस देखने वाले की ओर जाता है।
प्रश्न को छोड़कर प्रश्नकर्ता को देखिए। उत्तर को छोड़कर जानने वाले को जानिए। अहंकार से लड़ने के बजाय उसे सजगता से समझिए।
“यह सुख कौन अनुभव कर रहा है?”
“मैं कौन हूँ?”
जब खोजने वाला स्वयं को खोजने लगता है, तब द्रष्टा, दृश्य और खोज के बीच का भेद धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है।
वरुण पीठाधीश्वर डॉ. श्री दुर्गेश गिरी महाराज
आध्यात्मिक चिंतन, आत्मविचार, जागरूकता और सनातन जीवन मूल्यों पर आधारित विशेष विचार।
