दानशील स्त्री-पुरुष ही सर्वप्रिय होते हैं :
मत्स्यपुराण की दृष्टि से उदारता का महत्व
भारतीय संस्कृति में दान को केवल धन देने की क्रिया नहीं माना गया है, बल्कि इसे मानवता, करुणा, प्रेम और सामाजिक उत्तरदायित्व का सर्वोच्च स्वरूप बताया गया है। हमारे शास्त्रों में दान को धर्म का महत्वपूर्ण अंग माना गया है। इसी संदर्भ में मत्स्यपुराण के 224वें अध्याय के द्वितीय और तृतीय श्लोकों में भगवान मत्स्य ने महाराज मनु को दान की महिमा बताते हुए यह स्पष्ट किया है कि संसार में वही व्यक्ति सर्वप्रिय बनता है जो उदार और दानशील होता है।
भगवान मत्स्य कहते हैं—
“न सोऽस्ति राजन् दानेन वशगो यो न जायते।
दानेन वशगा देवा भवन्तीह सदा नृणाम्।।”
अर्थात हे राजन्! संसार में ऐसा कोई नहीं है जो दान के प्रभाव से प्रभावित न हो जाए। यहां तक कि देवता भी दान, यज्ञ और समर्पण से प्रसन्न होकर मनुष्यों की इच्छाओं को पूर्ण करते हैं।
दान का वास्तविक अर्थ
अधिकांश लोग दान का अर्थ केवल धन देने से लगाते हैं, जबकि शास्त्रों की दृष्टि में दान का अर्थ कहीं अधिक व्यापक है। भूखे को भोजन देना, प्यासे को जल देना, निराश व्यक्ति को आशा देना, दुखी को सांत्वना देना, जरूरतमंद को वस्त्र देना, किसी को सम्मान देना या प्रेम प्रदान करना भी दान ही है।दान केवल हाथ से नहीं, हृदय से किया जाता है। यही कारण है कि एक मधुर शब्द भी कभी-कभी लाखों रुपये के दान से अधिक मूल्यवान सिद्ध हो सकता है।
लोभ और उदारता का अंतर
मानव समाज में दो प्रकार की प्रवृत्तियां स्पष्ट दिखाई देती हैं—लोभ और उदारता।लोभी व्यक्ति जीवनभर धन संग्रह करता रहता है। उसके लिए धन ही सबसे बड़ा लक्ष्य बन जाता है। वह न तो स्वयं सुखपूर्वक जीवन जीता है और न ही दूसरों को सुख देने का प्रयास करता है। उसके लिए धन की हानि सबसे बड़ा दुख होती है। वह सम्मान, संबंध और मानवता से अधिक महत्व धन को देता है।इसके विपरीत उदार व्यक्ति धन को साधन मानता है, साध्य नहीं। वह जानता है कि धन का वास्तविक मूल्य तभी है जब उसका उपयोग समाज और मानवता के हित में किया जाए। उदार व्यक्ति आवश्यकता पड़ने पर अपने संसाधनों का उपयोग दूसरों की सहायता के लिए करता है और इसी कारण वह समाज में सम्मान प्राप्त करता है।
दान से प्रेम और विश्वास की प्राप्ति
भगवान मत्स्य कहते हैं—
“न सोऽस्ति राजन् दानेन वशगो यो न जायते।”
इस श्लोक का गूढ़ अर्थ यह है कि संसार में प्रत्येक प्राणी प्रेम, सहयोग और संवेदना का भूखा है। जब किसी व्यक्ति की आवश्यकता के समय सहायता की जाती है, तो उसके मन में स्वाभाविक रूप से कृतज्ञता और स्नेह उत्पन्न होता है।यह केवल मनुष्यों पर ही लागू नहीं होता। पशु-पक्षी भी प्रेम और संरक्षण के बदले स्नेह प्रकट करते हैं। जो व्यक्ति जीवों के प्रति करुणा रखता है, वे जीव भी उसके प्रति विश्वास और अपनापन प्रदर्शित करते हैं।आज के युग में भी यह सत्य उतना ही प्रासंगिक है। कार्यालयों, परिवारों और समाज में वे लोग अधिक प्रिय होते हैं जो सहयोगी और उदार स्वभाव के होते हैं। केवल अधिकार और कठोरता से लोगों का दिल नहीं जीता जा सकता; इसके लिए उदारता और संवेदनशीलता आवश्यक है।
देवता भी दान से प्रसन्न होते हैं
भगवान मत्स्य आगे कहते हैं—
“दानेन वशगा देवा भवन्तीह सदा नृणाम्।”
भारतीय धार्मिक परंपरा में यज्ञ, हवन, पूजा और अर्पण का विशेष महत्व है। इन सभी का मूल भाव दान और समर्पण ही है। जब मनुष्य अपनी प्रिय वस्तुओं का अर्पण ईश्वर को करता है, तो वह त्याग और श्रद्धा का प्रदर्शन करता है।शास्त्रों का संदेश यह है कि दान केवल सामाजिक संबंधों को ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति को भी सुदृढ़ करता है। दान मनुष्य के भीतर से अहंकार और स्वार्थ को कम करता है तथा उसे ईश्वर के अधिक निकट ले जाता है।
संसार का आधार ही परस्पर दान है
तृतीय श्लोक में भगवान मत्स्य कहते हैं—
“दानमेवोपजीवन्ति प्रजारूसर्वा नृपोत्तम।”
अर्थात हे मनु! समस्त प्रजा और समस्त जीव-जगत किसी न किसी रूप में दान पर ही आधारित है।यदि गहराई से विचार किया जाए तो पूरा समाज आदान-प्रदान और परस्पर सहयोग की व्यवस्था पर चलता है। नागरिक कर देते हैं, जिससे सरकार प्रशासन चलाती है। किसान अन्न प्रदान करता है, शिक्षक ज्ञान देता है, चिकित्सक स्वास्थ्य सेवा देता है, मजदूर श्रम देता है और व्यापारी वस्तुएं उपलब्ध कराता है।हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में कुछ न कुछ प्रदान कर रहा है और बदले में कुछ प्राप्त कर रहा है। यही सामाजिक जीवन का आधार है।प्रकृति भी निरंतर दान करती रहती है। सूर्य प्रकाश देता है, नदियां जल देती हैं, वृक्ष फल और छाया प्रदान करते हैं। यदि प्रकृति केवल संग्रह करती और कुछ न देती, तो जीवन संभव नहीं होता।
दान से मिलता है यश और सम्मान
भगवान मत्स्य का अंतिम संदेश अत्यंत महत्वपूर्ण है—
“प्रियो हि दानवान् लोके सर्वस्यैवोपजायते।”
अर्थात इस संसार में दानशील व्यक्ति ही सबका प्रिय बनता है।धन, पद और शक्ति से भय उत्पन्न किया जा सकता है, लेकिन प्रेम नहीं प्राप्त किया जा सकता। प्रेम और सम्मान केवल उदारता, सेवा और सद्भावना से अर्जित होते हैं।इतिहास में जिन व्यक्तियों को समाज ने सदियों तक स्मरण रखा, वे केवल धनवान नहीं थे, बल्कि दानशील और लोकहितकारी भी थे। राजा हरिश्चंद्र, दानवीर कर्ण, भामाशाह और अनेक संत-महात्माओं का यश आज भी इसलिए जीवित है क्योंकि उन्होंने अपने जीवन को दूसरों के कल्याण के लिए समर्पित किया।
आधुनिक समाज में दान की आवश्यकता
आज का युग भौतिक प्रगति का युग है, लेकिन इसके साथ ही स्वार्थ, प्रतिस्पर्धा और अकेलेपन की समस्याएं भी बढ़ी हैं। ऐसे समय में दान की भावना पहले से अधिक आवश्यक हो गई है।दान का अर्थ केवल बड़ी राशि देना नहीं है। कोई व्यक्ति अपने समय का दान कर सकता है, ज्ञान का दान कर सकता है, रक्तदान कर सकता है, शिक्षा का सहयोग कर सकता है या किसी जरूरतमंद को मार्गदर्शन देकर भी दान कर सकता है।यदि समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार कुछ देने की भावना विकसित करे, तो अनेक सामाजिक समस्याओं का समाधान संभव हो सकता है।
मत्स्यपुराण का यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना हजारों वर्ष पूर्व था। दान केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि मानव जीवन की सर्वोच्च नैतिकता है। लोभ मनुष्य को संकीर्ण बनाता है, जबकि उदारता उसे महान बनाती है।जो व्यक्ति दूसरों के सुख-दुख में सहभागी बनता है, सहायता का हाथ बढ़ाता है और अपने संसाधनों का उपयोग लोककल्याण के लिए करता है, वही वास्तव में समाज का प्रिय बनता है। इसलिए प्रत्येक स्त्री और पुरुष को अपने जीवन में दान, सेवा और उदारता के गुणों को स्थान देना चाहिए।अंततः यही सत्य है कि धन का संग्रह मनुष्य को समृद्ध बना सकता है, लेकिन दान ही उसे सम्मानित, लोकप्रिय और अमर बनाता है।
— आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, वृंदावनधाम
