अपनों के बिना जीत किसी काम की नहीं होती
महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था। कुरुक्षेत्र की धरती पर चारों ओर विनाश का दृश्य था। लाखों योद्धा वीरगति को प्राप्त हो चुके थे। माताओं की गोद सूनी हो गई थी, पत्नियां विधवा हो चुकी थीं और परिवार बिखर गए थे। ऐसे समय में जब पाण्डवों ने विजय प्राप्त कर ली थी, तब भी धर्मराज युधिष्ठिर के चेहरे पर प्रसन्नता नहीं थी।
कथा के अनुसार श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से पूछा, “राजन! आपने धर्म की स्थापना की है, अधर्म का अंत हुआ है। यह विजय इतिहास में अमर होगी। फिर आपके नेत्रों में आँसू क्यों हैं?”युधिष्ठिर ने अत्यंत भावुक होकर उत्तर दिया, “केशव! इस विजय का मैं क्या करूं? मेरे अपने ही नहीं रहे। भीष्म पितामह, गुरु द्रोण, कर्ण, मेरे भाई समान अनेक योद्धा और मेरा प्रिय पुत्र अभिमन्यु सब चले गए। जब अपने ही नहीं बचे तो इस सिंहासन और इस राज्य का क्या महत्व है?”युधिष्ठिर का यह उत्तर केवल महाभारत के समय के लिए ही नहीं, बल्कि आज के युग के लिए भी उतना ही प्रासंगिक है। आज हम सभी अपने-अपने जीवन के कुरुक्षेत्र में संघर्ष कर रहे हैं। कोई धन कमाने की दौड़ में है, कोई पद और प्रतिष्ठा पाने की होड़ में, तो कोई अपने करियर को ऊंचाइयों तक पहुंचाने में लगा हुआ है। लेकिन इस दौड़ में हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि सफलता का वास्तविक आनंद तभी है जब उसे अपने लोगों के साथ साझा किया जा सके।
आज कई लोग बैंक बैलेंस बढ़ाने के लिए दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। बेहतर जीवन की तलाश में वे अपनी नींद, स्वास्थ्य और मानसिक शांति तक खो देते हैं। करियर की सीढ़ियां चढ़ते-चढ़ते वे अपने परिवार से दूर हो जाते हैं। माता-पिता, जो कभी उनकी दुनिया थे, अब केवल फोन कॉल तक सीमित रह जाते हैं।कई बार सफलता की अंधी दौड़ हमें इतना स्वार्थी बना देती है कि हम उन रिश्तों को ही नजरअंदाज कर देते हैं जिन्होंने कठिन समय में हमारा साथ दिया था। सच्चे मित्र, भाई-बहन, माता-पिता और जीवनसाथी धीरे-धीरे हमारी प्राथमिकताओं से बाहर हो जाते हैं। हम यह मान बैठते हैं कि धन और उपलब्धियां ही जीवन का अंतिम लक्ष्य हैं।लेकिन जीवन का सबसे बड़ा सत्य यह है कि रिश्तों की गर्माहट किसी भी उपलब्धि से अधिक मूल्यवान होती है। एक आलीशान घर, महंगी गाड़ी या बड़ा पद आपको सम्मान तो दिला सकता है, लेकिन वह अपनापन नहीं दे सकता जो परिवार और प्रियजनों के साथ मिलने वाली मुस्कान में होता है।
आज समाज में ऐसे अनेक उदाहरण देखने को मिलते हैं जहां लोग करोड़ों की संपत्ति तो बना लेते हैं, लेकिन उनके पास अपने दुख-सुख बांटने वाला कोई नहीं होता। दूसरी ओर, सीमित साधनों वाले परिवार भी खुश रहते हैं क्योंकि उनके पास एक-दूसरे का साथ होता है।इसलिए जीवन में सफलता प्राप्त करना गलत नहीं है, लेकिन सफलता की कीमत रिश्ते नहीं होने चाहिए। धन, पद और प्रतिष्ठा फिर से कमाई जा सकती है, लेकिन खोए हुए रिश्ते और बीता हुआ समय वापस नहीं आता।समय रहते अपने प्रियजनों के लिए समय निकालिए। माता-पिता के साथ बैठिए, दोस्तों से मिलिए, परिवार के साथ हंसिए और जीवन के छोटे-छोटे पलों का आनंद लीजिए। क्योंकि अंत में मनुष्य को उसकी उपलब्धियां नहीं, बल्कि उसके रिश्ते याद आते हैं।
याद रखिए, जीवन की सबसे बड़ी जीत वही है जिसमें अपने साथ हों। क्योंकि अपनों के बिना जीत किसी काम की नहीं होती।
