भारतीय धर्मसंघ भारतीय संस्कुति, अध्यात्म और नैतिक मूल्यों
को आगे बढ़ाने के लिए समर्पित एक सामाजिक संगडन है।
हमारा उद्देश्य समाज को उसकी जड़ों से जोड़ना और
मानवता, सेवा और सत्य के मार्ग पर चलने हेतु प्रेरित करना है।
धर्म की रक्षा करने वाला, धर्म द्वारा ही सुरक्षित रहता है।
आज के समय में जद समाज पश्चिमी प्रभाव, नैतिक पतन और सांस्कृतिक
भाम के दीर से गुजर रहा है, तब भारतीय धर्मसंघ भारतीय मूल्यों को बचाने
और नई पीढ़ी तक पहुँचाने का कार्य कर रहा है। यह संस्या समाज को उसकी
जढ़ों से जोड़ने का प्रयास कर रही है, ताकि आने वाली पेढ़ियों अपनी संस्कृति,
धर्म और परंपराओं पर गर्व कर सकें।
भारतीय संस्कुति, परंपराओं और सनातन धर्म की रक्षा और प्रचार करना।
युवाओं को नैतिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक शिक्षा देकर जागरूक बनाना।
समाज में व्याप्त कुरीतियों को दुर कर मानवता और सेवा की भावना को बढ़ाना।
समाज में एकता, भाईचारा और सद्भाव को बढ़ाकर राष्ट्र निर्माण में योगदान देना।
सुनीता मिश्रा संघर्ष, धैर्य, संस्कार और समाजसेवा की एक प्रेरणादायक मिसाल हैं। जीवन की अनेक चुनौतियों, पारिवारिक जिम्मेदारियों और कठिन परिस्थितियों का उन्होंने साहस और धैर्य के साथ सामना किया। अपने जीवन के अनुभवों को उन्होंने कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी शक्ति बनाया और सेवा के मार्ग को अपने जीवन का उद्देश्य चुना।
परिवार और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए उन्होंने शिक्षा, संस्कार, धर्म और सामाजिक जागरूकता के महत्व को समझा। आज वे भारतीय धर्मसंघ की संयोजक के रूप में समाज को सेवा, एकता और भारतीय संस्कृति के मूल्यों से जोड़ने के प्रयासों में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।
महामंडलेश्वर पुरुषोत्तम दास जी महाराज सनातन आध्यात्मिक परंपरा, रामभक्ति, साधना और मानव सेवा से जुड़े संत के रूप में श्रद्धालुओं के बीच सम्मानित हैं। अयोध्या की मणिराम छावनी की संत परंपरा से जुड़े महाराज जी का जीवन भक्ति, अनुशासन, त्याग और सेवा की प्रेरणा देता है। भारतीय धर्म संघ के संरक्षक के रूप में वे आध्यात्मिक जागरण, धर्म-संस्कृति के संरक्षण और समाज में सेवा एवं सद्भाव की भावना को आगे बढ़ाने का संदेश देते हैं। उनके विचारों में श्रीराम के आदर्श, मानवता की सेवा और सरल-सात्त्विक जीवन को विशेष महत्व दिया जाता है।
वरुण पीठाधीश्वर स्वामी दुर्गेश गिरी महाराज भारतीय सनातन संत परंपरा, अखाड़ा संस्कृति और साधना के आध्यात्मिक प्रवाह से जुड़े संत के रूप में प्रस्तुत किए जाते हैं। ध्यान, ज्ञान, गुरु-शिष्य परंपरा और मानव कल्याण को जीवन की साधना मानने वाली उनकी आध्यात्मिक दृष्टि भारतीय संस्कृति के शाश्वत मूल्यों से जुड़ती है। वरुण पीठ, गुरुकुल, ध्यान-ज्ञान और सेवा के माध्यम से आत्मचिंतन, संस्कार और लोककल्याण की भावना को आगे बढ़ाने का संदेश उनके परिचय में प्रमुखता से उभरता है।



