सबसे बड़ी शक्ति कौन—
माँ कामाख्या या माँ बगलामुखी?
जब माँ कामाख्या ने सिखाया कि सभी महाविद्याएँ एक ही अनंत आदिशक्ति के दिव्य स्वरूप हैं।
सनातन परंपरा में देवी उपासना का संसार अत्यंत व्यापक, गहरा और आध्यात्मिक रहस्यों से परिपूर्ण है। माँ काली, माँ तारा, माँ त्रिपुरसुंदरी, माँ भुवनेश्वरी, माँ भैरवी, माँ छिन्नमस्ता, माँ धूमावती, माँ बगलामुखी, माँ मातंगी और माँ कमला—दस महाविद्याओं के इन स्वरूपों की अपनी-अपनी विशेषताएँ हैं।
लेकिन क्या इनमें कोई एक शक्ति दूसरी से बड़ी है? या फिर सभी स्वरूप उसी एक परम आदिशक्ति की अलग-अलग अभिव्यक्तियाँ हैं? इसी प्रश्न का उत्तर एक भक्त पुजारी के जीवन में घटी आध्यात्मिक अनुभूति के माध्यम से मिलता है।
माँ कामाख्या के अनन्य भक्त की भक्ति
पुजारी जी का जीवन माँ कामाख्या की भक्ति को समर्पित था। उनके लिए माँ केवल देवी नहीं, बल्कि माता, गुरु, शक्ति और जीवन का आधार थीं। सुख हो या दुख, सफलता हो या कठिनाई—हर परिस्थिति में वे माँ के चरणों को याद करते थे।
जब वे दुखी होते तो माँ को याद करते, जब प्रसन्न होते तो माँ का धन्यवाद करते और जब जीवन में रास्ता दिखाई नहीं देता तो माँ के चरणों में अपना सिर झुका देते।
माँ बगलामुखी के दर्शन की इच्छा
समय के साथ उनके मन में हिमाचल प्रदेश स्थित माँ बगलामुखी के प्रसिद्ध वनखंडी धाम में दर्शन करने की इच्छा जागी। उन्होंने कई बार यात्रा की योजना बनाई, लेकिन हर बार कोई न कोई परिस्थिति सामने आ गई।
पहली बाधा
यात्रा रुकने पर उन्होंने सोचा—शायद अभी माँ का बुलावा नहीं आया है।
दूसरी बाधा
उन्होंने स्वयं को समझाया—जब माँ बुलाएँगी, तब अवश्य उनके चरणों तक पहुँचूँगा।
बार-बार रुकता रास्ता
लेकिन जब बार-बार यात्रा रुकने लगी तो उनके मन में प्रश्न उठा—मैं दर्शन के लिए इतना प्रयास करता हूँ, फिर रास्ता क्यों नहीं खुल रहा?
श्रद्धा और अहंकार के बीच की महीन रेखा
इसी दौरान उनके मन में एक सूक्ष्म भावना जन्म लेने लगी। माँ कामाख्या के प्रति उनकी भक्ति इतनी गहरी थी कि कहीं न कहीं उन्हें लगने लगा कि उनकी आराध्या ही सबसे बड़ी शक्ति हैं।
श्रद्धा कहती है—“मेरी माँ महान हैं।”
लेकिन अहंकार धीरे से कहता है—“केवल मेरी माँ ही सबसे महान हैं।”
पुजारी जी के मन में यह भावना किसी बुरी नीयत से नहीं आई थी। वे माँ के प्रेम में डूबे हुए थे। लेकिन साधना के मार्ग पर मन की छोटी-सी गाँठ भी कभी-कभी साधक की परीक्षा बन जाती है।
वह दिव्य स्वप्न जिसने बदल दिया जीवन
एक रात दिनभर की भागदौड़ और अनेक विचारों के बाद पुजारी जी सो गए। उसी रात उन्होंने एक ऐसा स्वप्न अनुभव किया जिसने उनके भीतर की दुनिया बदल दी।
माँ का दिव्य संदेश
“हे पुत्र! शक्ति एक है, स्वरूप अनेक हैं। नाम अलग हो सकते हैं, मंदिर अलग हो सकते हैं और उपासना की विधियाँ अलग हो सकती हैं, लेकिन शक्ति का मूल स्रोत एक ही है।”
दस महाविद्याएँ — एक ही परम शक्ति के स्वरूप
पुजारी जी को अनुभव हुआ कि अलग-अलग देवी स्वरूप वास्तव में उसी अनंत शक्ति की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं। प्रत्येक स्वरूप साधक को जीवन का एक अलग आध्यात्मिक संदेश देता है।
माँ काली
समय, परिवर्तन और अहंकार के विनाश की दिव्य शक्ति।
माँ तारा
करुणा, मार्गदर्शन और संकट से पार लगाने वाली शक्ति।
माँ त्रिपुरसुंदरी
सौंदर्य, चेतना, संतुलन और परम ज्ञान का स्वरूप।
माँ भुवनेश्वरी
संपूर्ण ब्रह्मांडीय सत्ता और व्यापक चेतना की अभिव्यक्ति।
माँ भैरवी
साधक में निर्भयता, शक्ति और आंतरिक दृढ़ता जगाने वाली शक्ति।
माँ छिन्नमस्ता
त्याग, आत्मबोध और आसक्ति से ऊपर उठने का संदेश।
माँ धूमावती
जीवन के गहरे सत्य, वैराग्य और अनुभव की शक्ति।
माँ बगलामुखी
नकारात्मकता और भीतर के क्रोध, मोह, ईर्ष्या तथा अहंकार पर विजय की प्रेरणा।
माँ मातंगी
ज्ञान, वाणी, कला और अभिव्यक्ति की दिव्य शक्ति।
माँ कमला
समृद्धि, संतुलन, मंगल और जीवन की पूर्णता का स्वरूप।
पुजारी जी को हुआ अपनी भूल का एहसास
इस दिव्य अनुभूति के बाद पुजारी जी को समझ आया कि किसी एक देवी को अपनी आराध्या मानना अत्यंत सुंदर भक्ति है, लेकिन दूसरे दिव्य स्वरूपों को छोटा समझना साधना की भावना के विपरीत है।
उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। उन्होंने मन ही मन माँ से प्रार्थना की—
“माँ, यदि मेरे मन में कभी यह भाव आया कि एक शक्ति दूसरी से बड़ी या छोटी है, तो मुझे क्षमा करना। मेरे भीतर से अहंकार दूर कर दो और मुझे ऐसी दृष्टि दो कि मैं सभी दिव्य स्वरूपों में उसी एक परम शक्ति का दर्शन कर सकूँ।”
माँ अपने बच्चे को रास्ता दिखाती हैं
एक सच्चे साधक की सबसे बड़ी पहचान यह नहीं होती कि वह कितने मंत्र जानता है, कितने मंदिरों में गया है या कितनी पूजा करता है।
सच्चे साधक की पहचान यह है कि वह अपनी भूल को पहचान सके, उसे स्वीकार कर सके और अपने भीतर परिवर्तन लाने का साहस रख सके।
माँ की करुणा
माँ अपने बच्चे की गलतियों से उससे घृणा नहीं करतीं। वे उसे समझाती हैं, संभालती हैं और सही रास्ता दिखाती हैं। जब बच्चा सच्चे हृदय से अपनी भूल स्वीकार करता है, तो माँ की करुणा उसके लिए बंद द्वार भी खोल देती है।
अंततः खुल गया माँ बगलामुखी के दरबार का रास्ता
समय बीतता गया। एक दिन परिस्थितियाँ बदल गईं। जिस यात्रा के लिए पुजारी जी ने कई बार प्रयास किया था, इस बार वही अवसर सहज रूप से उनके जीवन में आया।
उन्होंने इस बार भी तैयारी की, लेकिन उनके मन में पहले जैसा आग्रह नहीं था। अब उनके भीतर केवल विनम्रता थी।
“माँ, यदि आपकी इच्छा होगी तो मैं आऊँगा। यदि आप बुलाएँगी तभी आपके चरणों तक पहुँच पाऊँगा।”
आखिरकार वह दिन आया जिसका उन्हें लंबे समय से इंतजार था। उन्हें हिमाचल प्रदेश के वनखंडी धाम में माँ बगलामुखी के चरणों में माथा टेकने का अवसर प्राप्त हुआ।
जब उन्होंने माता के चरणों में सिर झुकाया तो उनके मन में कोई तुलना नहीं थी। वहाँ कोई बड़ा और छोटा नहीं था। वहाँ केवल माँ थीं और उनका एक छोटा-सा पुत्र।
उनकी आँखों में आँसू थे, लेकिन इस बार वे आँसू दुख के नहीं, बल्कि कृतज्ञता के थे।
उन्हें ऐसा लगा जैसे माँ कामाख्या ने ही उन्हें माँ बगलामुखी के चरणों तक पहुँचाया हो—जैसे एक माँ ने अपने बच्चे को अपने ही दूसरे स्वरूप के दर्शन करवाए हों।
“भक्ति में प्रेम होना चाहिए, अधिकार नहीं।”
“साधना में विश्वास होना चाहिए, अहंकार नहीं। अपने इष्ट के प्रति अटूट श्रद्धा रखो, लेकिन दूसरे दिव्य स्वरूपों के प्रति भी उतना ही सम्मान रखो।”
इस कथा से मिलने वाली तीन बड़ी सीख
विनम्रता
साधना जितनी गहरी होती है, साधक के भीतर विनम्रता उतनी ही बढ़नी चाहिए।
सच्ची भक्ति
अपने इष्ट से प्रेम करें, लेकिन दूसरे दिव्य स्वरूपों का सम्मान भी बनाए रखें।
एकत्व का ज्ञान
नाम और स्वरूप अनेक हो सकते हैं, लेकिन परम शक्ति का मूल भाव एक ही है।
सबसे बड़ी शक्ति कौन?
पुजारी जी की यात्रा केवल कामाख्या से बगलामुखी तक की यात्रा नहीं थी। यह उनके भीतर के अहंकार से विनम्रता तक की यात्रा थी।
यह किसी एक मंदिर तक पहुँचने की यात्रा नहीं थी। यह आत्मज्ञान तक पहुँचने की यात्रा थी।
शायद माँ ने उन्हें कई बार इसलिए रोका क्योंकि पहले उन्हें अपने भीतर की यात्रा पूरी करनी थी। जब तक साधक अपने मन के अहंकार और श्रेष्ठता-बोध को नहीं पहचानता, तब तक बाहरी तीर्थों की यात्रा भी अधूरी रह सकती है।
लेकिन जिस दिन साधक विनम्र होकर माँ के सामने खड़ा हो जाता है, उसी दिन उसके भीतर ज्ञान का द्वार खुलने लगता है।
इसलिए प्रश्न यह नहीं कि माँ कामाख्या बड़ी हैं या माँ बगलामुखी। सच्चा प्रश्न यह है कि क्या हम उनके विभिन्न स्वरूपों में उसी एक अनंत आदिशक्ति को पहचान पाते हैं?
किसी भक्त के लिए माँ कामाख्या सर्वोच्च आराध्या हो सकती हैं, किसी के लिए माँ बगलामुखी, किसी के लिए माँ काली और किसी के लिए माँ दुर्गा।
लेकिन इससे परम शक्ति अनेक नहीं हो जाती।
शक्ति को बाँटा नहीं जा सकता।
गुरुजी, आवाहन अखाड़ा
