विसर्जन के दिन पूरे गांव में नहीं जलता चूल्हा, 100 साल पुरानी परंपरा आज भी कायम
जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण के साथ राधारानी और मां भगवती की पूजा, प्रतिमा विसर्जन के दिन चूड़ा-दही और फलाहार करते हैं ग्रामीण
बिहार के सुपौल जिले में जन्माष्टमी का एक ऐसा आयोजन होता है, जिसकी परंपरा आज भी लोगों के लिए आस्था और अनुशासन की मिसाल बनी हुई है। प्रतिमा विसर्जन के दिन पूरे गांव में किसी भी घर का चूल्हा नहीं जलता। ग्रामीण चूड़ा-दही, फल और अन्य फलाहार ग्रहण करके इस करीब एक सदी पुरानी परंपरा को निभाते हैं।
सुपौल जिला मुख्यालय से करीब छह किलोमीटर उत्तर स्थित बसबिट्टी कुंवर टोला में हर साल जन्माष्टमी का पर्व बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। स्थानीय लोगों के अनुसार, यहां यह परंपरा करीब 100 वर्षों से चली आ रही है।
पीढ़ी दर पीढ़ी ग्रामीण इस धार्मिक आयोजन को पूरी आस्था के साथ आगे बढ़ा रहे हैं। यहां जन्माष्टमी केवल भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव तक सीमित नहीं रहती, बल्कि राधारानी और मां भगवती की भी विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।
करीब 100 साल पुरानी है परंपरा
बसबिट्टी कुंवर टोला में जन्माष्टमी का आयोजन गांव की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। बुजुर्गों के समय से चली आ रही इस परंपरा को आज की पीढ़ी भी उसी श्रद्धा के साथ निभा रही है।
प्रतिमा स्थापना के लिए करना पड़ता है इंतजार
पूजा समिति के अध्यक्ष शुभंकर कुंवर के अनुसार, यहां प्रतिमा निर्माण और स्थापना की जिम्मेदारी लेना विशेष सौभाग्य माना जाता है। प्रतिमा स्थापित कराने की इच्छा रखने वाले ग्रामीणों को अपनी बारी आने के लिए कई वर्षों तक इंतजार करना पड़ सकता है।
इस वर्ष प्रतिमा निर्माण और स्थापना की जिम्मेदारी बसबिट्टी निवासी विजय सिंह ने ली है। विजय सिंह पटना में ठेकेदारी का काम करते हैं और इस वर्ष के मूर्ति दाता हैं।
ग्रामीणों के बीच प्रतिमा दान को धार्मिक आस्था और सौभाग्य से जोड़कर देखा जाता है। यही कारण है कि प्रतिमा स्थापना की जिम्मेदारी लेने को लेकर लोगों में विशेष उत्साह रहता है।
विसर्जन के दिन नहीं जलता चूल्हा
बसबिट्टी कुंवर टोला की जन्माष्टमी की सबसे अनोखी परंपरा प्रतिमा विसर्जन के दिन देखने को मिलती है। वर्षों से चली आ रही मान्यता के अनुसार, उस दिन पूरे गांव में किसी भी घर का चूल्हा नहीं जलाया जाता।
ग्रामीण इस परंपरा को पूरी श्रद्धा और अनुशासन के साथ निभाते हैं। परिवार के सभी सदस्य इस दिन धार्मिक आयोजन में भाग लेते हैं। उनके लिए यह केवल एक नियम नहीं, बल्कि पूर्वजों से मिली धार्मिक विरासत है।
विसर्जन यात्रा में जुटते हैं हजारों श्रद्धालु
प्रतिमा विसर्जन के दौरान बसबिट्टी और आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। ढोल-नगाड़ों और भगवान के जयकारों के बीच विसर्जन यात्रा निकाली जाती है।
इस दौरान पूरा इलाका भक्तिमय माहौल में डूब जाता है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक में उत्साह देखने को मिलता है। आसपास के गांवों से आने वाले श्रद्धालुओं के कारण आयोजन की रौनक और भी बढ़ जाती है।
- ढोल-नगाड़ों के साथ निकाली जाती है विसर्जन यात्रा
- भगवान श्रीकृष्ण के जयकारों से गूंजता है इलाका
- आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में पहुंचते हैं श्रद्धालु
- विसर्जन के दिन ग्रामीण करते हैं फलाहार
पूजा समिति संभाल रही आयोजन की जिम्मेदारी
इस वर्ष जन्माष्टमी महोत्सव की व्यवस्था पूजा समिति की देखरेख में हो रही है। समिति के अध्यक्ष शुभंकर कुंवर, सचिव पंकज कुंवर और कोषाध्यक्ष अरुण कुंवर सहित अन्य सदस्य आयोजन की जिम्मेदारियां संभाल रहे हैं।
आयोजन को सफल बनाने में गांव के लोग भी अपनी भूमिका निभाते हैं। पूजा की व्यवस्था से लेकर श्रद्धालुओं की सुविधा और विसर्जन यात्रा तक, अलग-अलग जिम्मेदारियां ग्रामीण मिलकर निभाते हैं।
आस्था और परंपरा का अनूठा संगम
बसबिट्टी कुंवर टोला की जन्माष्टमी धार्मिक आस्था, सामूहिक सहभागिता और वर्षों पुरानी परंपरा का अनूठा संगम है। भगवान श्रीकृष्ण और राधारानी के साथ मां भगवती की पूजा, प्रतिमा स्थापना की लंबी प्रतीक्षा और विसर्जन के दिन पूरे गांव में चूल्हा न जलाने की परंपरा इस आयोजन को खास बनाती है।
करीब एक सदी से चली आ रही यह परंपरा आज भी गांव के लोगों को एक सूत्र में बांध रही है। बदलते दौर में भी ग्रामीण अपनी धार्मिक विरासत को संजोकर रखे हुए हैं और नई पीढ़ी तक इसे पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं।
