द्रष्टा-दृश्य का भेद कैसे गिराया जाए?
स्वयं को जानने, अहंकार को समझने और अपने मूल जागरूक स्वरूप की ओर लौटने की आध्यात्मिक यात्रा
मनुष्य का अधिकांश जीवन बाहर की वस्तुओं, परिस्थितियों और अनुभवों को समझने में बीत जाता है। हम सुख का कारण खोजते हैं, दुख से बचने का उपाय तलाशते हैं और हर प्रश्न का उत्तर पाने की कोशिश करते हैं। लेकिन अध्यात्म की दृष्टि से एक प्रश्न इन सभी प्रश्नों से अधिक महत्वपूर्ण है—जो प्रश्न पूछ रहा है, वह कौन है?
उसे खोजें जो खोज रहा है। ”
प्रश्न और उत्तर से आगे की यात्रा
हमारा ध्यान सामान्यतः प्रश्न और उसके उत्तर पर रहता है। यदि मन में कोई समस्या है तो हम उसका समाधान खोजते हैं। यदि दुख है तो दुख दूर करने का प्रयास करते हैं और सुख है तो उसे बनाए रखना चाहते हैं। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में हम उस व्यक्ति को भूल जाते हैं जिसे दुख या सुख का अनुभव हो रहा है।
वास्तव में महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं कि “मुझे क्या चाहिए?”, बल्कि यह है कि “चाहने वाला कौन है?”
न प्रश्न अंतिम सत्य है, न उत्तर। महत्वपूर्ण है उस चेतना को पहचानना जो प्रश्न करती है, अनुभव करती है और जानना चाहती है।
अहंकार से भागना नहीं, उसे समझना है
आध्यात्मिक मार्ग में अहंकार को अक्सर बंधन का कारण माना जाता है। लेकिन समस्या यह है कि अहंकार से भागने की कोशिश भी अहंकार ही करता है। हम कहते हैं—“मुझे अहंकार छोड़ना है।” मगर यह कहने वाला भी वही ‘मैं’ है।
इसलिए आवश्यकता अहंकार को दबाने या उससे युद्ध करने की नहीं, बल्कि उसे देखने की है। कभी हम दुखी होते हैं, कभी प्रसन्न। कभी क्रोध आता है, कभी चिंता घेर लेती है। कभी हम स्वयं को सफल मानते हैं और कभी असफल।
हमारे अनुभव बदलते रहते हैं, लेकिन इन अनुभवों को जानने वाला कौन है—यह प्रश्न स्थिर रहता है। यहीं से आत्मचिंतन प्रारंभ होता है।
दुख को देखें
दुख से भागने के बजाय देखें कि दुख का अनुभव किसे हो रहा है।
सुख को देखें
सुख में भी सजग रहें और सुख का अनुभव करने वाले को पहचानें।
स्वयं को देखें
हर अनुभव के पीछे मौजूद ‘मैं’ की वास्तविकता को जानने का प्रयास करें।
पीड़ित अहंकार ही साधना की सीढ़ी बन सकता है
जब मनुष्य दुख में होता है, तब वह अपने दुख से दूर भागना चाहता है। लेकिन यदि उसी समय वह थोड़ी सजगता के साथ पूछे—“यह दुख किसे हो रहा है?” तो ध्यान दुख से हटकर दुख का अनुभव करने वाले पर जाता है।
यदि उत्तर आए—“मुझे”, तो अगला प्रश्न हो सकता है—“मैं कौन हूँ?”
यही आत्म-पड़ताल साधना का एक महत्वपूर्ण मार्ग है। दुखी अवस्था में भी स्वयं को देखना है और सुखी अवस्था में भी। क्रोधित होने पर क्रोध को देखने वाले को देखना है। चिंतित होने पर चिंता के अनुभवकर्ता को देखना है।
आत्मचिंतन का सबसे सरल प्रश्न
इस प्रश्न का उत्तर शब्दों में खोजने के बजाय उस ‘मैं’ की ओर ध्यान ले जाना ही साधना की दिशा बन सकता है।
द्रष्टा शरीर नहीं, जागरूकता है
रमण महर्षि की आत्म-विचार परंपरा में “मैं कौन हूँ?” का प्रश्न केंद्रीय महत्व रखता है। शरीर दिखाई देता है, विचार दिखाई देते हैं, भावनाएँ अनुभव होती हैं—लेकिन इन सबको जानने वाला द्रष्टा क्या है?
यदि हम शरीर को ही अपना अंतिम स्वरूप मान लेते हैं तो हमारी दृष्टि बाहर की ओर अधिक केंद्रित हो जाती है। विचारों की भीड़ बढ़ती जाती है और मनुष्य विचारों में उलझ जाता है।
ऐसा लगता है कि हम विचार कर रहे हैं, जबकि कई बार विचार ही हमारी दिशा तय करने लगते हैं। भय, क्रोध, चिंता, अपेक्षा और स्मृतियां मिलकर एक ऐसा मानसिक संसार बना देती हैं जिसमें मनुष्य स्वयं को भूल जाता है।
“द्रष्टा शरीर नहीं है।
द्रष्टा जागरूकता है।”
जल और काई का उदाहरण
इसे समझने के लिए जल और काई का उदाहरण बहुत सुंदर है। शांत जल के ऊपर काई जम जाती है। काई जल का मूल स्वरूप नहीं है, लेकिन वह जल की सतह को ढक देती है।
इसी प्रकार चेतना के ऊपर विचारों, इच्छाओं, संस्कारों और अहंकार की परतें जम जाती हैं। हम इन परतों को ही अपना स्वरूप समझने लगते हैं।
काई को देखकर जल से घृणा करने की आवश्यकता नहीं। पहले यह समझना आवश्यक है कि काई जल नहीं है। उसी प्रकार अहंकार को स्वीकार करना और उसे देखना आत्मज्ञान की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
स्वीकार से समाप्त होता है आत्मसंघर्ष
जब हम अपने भीतर के अहंकार को स्वीकार करते हैं, तब उससे लड़ाई कम होने लगती है। स्वयं को बदलने की बेचैनी धीरे-धीरे शांत होती है। इसका अर्थ यह नहीं कि मनुष्य अपने दोषों को उचित ठहराए, बल्कि यह है कि वह उन्हें ईमानदारी से देखे।
स्वीकार करना पलायन नहीं है। स्वीकार करना देखने की शुरुआत है।
जब भीतर का संघर्ष कम होता है, तब चेतना को अपनी गहराई में उतरने का अवसर मिलता है। धीरे-धीरे शरीर, विचार और भावनाओं से अलग उस जागरूक उपस्थिति का अनुभव होने लगता है जो इन सबको देख रही है।
समर्पण और परम शक्ति
यहीं से साधना का दूसरा आयाम सामने आता है—समर्पण। मनुष्य स्वयं को सब कुछ नियंत्रित करने वाला मानता है। लेकिन जब वह समझता है कि जीवन में असंख्य शक्तियां उसके नियंत्रण से बाहर हैं, तब भीतर विनम्रता पैदा होती है।
परम शक्ति को स्वीकार करना और उसके विधान के अनुरूप जीवन जीना इसी विनम्रता का रूप है। यदि हमारा आचरण दूसरों के हित में है, हम किसी का अनावश्यक अहित नहीं करते और सत्य तथा सद्भाव की दिशा में चलते हैं, तो हमारा जीवन उसी व्यापक व्यवस्था के साथ जुड़ने लगता है।
अंतिम संदेश
द्रष्टा और दृश्य का भेद गिराने की यात्रा बाहर कुछ खोजने की यात्रा नहीं, बल्कि खोजने वाले को खोजने की यात्रा है।
अहंकार से भागना नहीं है। दुख से भागना नहीं है। सुख से भी चिपकना नहीं है। जो जैसा अनुभव हो रहा है, उसे जागरूकता से देखना है और पूछना है—
शायद इसी प्रश्न में उस मौन द्वार की शुरुआत छिपी है, जिसके पार द्रष्टा और दृश्य का भेद धीरे-धीरे मिटने लगता है और मनुष्य अपने मूल, अखंड और जागरूक स्वरूप की ओर लौटने लगता है।
वरुण पीठाधीश्वर डॉ. श्री दुर्गेश गिरी महाराज
आध्यात्मिक चिंतन • आत्मचिंतन • सत्संग • सनातन दर्शन
