रोहतास की कुसमीं पहाड़ी में गूंजते हैं ‘लोहे जैसे’ पत्थर, वन देवी मंदिर से जुड़ा है अनोखा रहस्य | Asaram News

रोहतास की कुसमीं पहाड़ी में गूंजते हैं ‘लोहे जैसे’ पत्थर, वन देवी मंदिर से जुड़ा है अनोखा रहस्य
बिहार के रोहतास जिले में स्थित कुसमीं पहाड़ी इन दिनों अपनी प्राकृतिक खूबसूरती से ज्यादा एक अनोखे रहस्य और वर्षों पुरानी आस्था को लेकर चर्चा में है। करगहर प्रखंड के पहाड़ी गांव के पास स्थित इस पहाड़ी पर वन देवी का एक प्राचीन मंदिर है। मंदिर के आसपास बिखरे लाल रंग के पत्थर यहां आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए कौतूहल का विषय बने हुए हैं।

इन पत्थरों की सबसे खास बात यह है कि जब इन्हें लकड़ी या किसी दूसरे पत्थर से हल्के तौर पर ठोका जाता है, तो इनमें से धातु जैसी साफ आवाज सुनाई देती है। आवाज इतनी अलग होती है कि पहली बार इसे सुनने वाला व्यक्ति कुछ पल के लिए हैरान रह जाता है। स्थानीय लोगों के लिए यह केवल पत्थरों की आवाज नहीं, बल्कि मां वन देवी से जुड़ी आस्था और विश्वास का हिस्सा है।

पत्थरों की आवाज में छिपी आस्था

कुसमीं पहाड़ी पर आने वाले श्रद्धालु वन देवी मंदिर में पूजा-अर्चना करने के साथ इन अनोखे पत्थरों को भी जरूर देखते हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार पत्थरों पर प्रहार करने से निकलने वाली आवाज मां वन देवी तक पहुंचती है और देवी अपने भक्तों की मनोकामनाएं सुनती हैं।

यही विश्वास इस स्थान को आसपास के गांवों के लोगों के लिए विशेष बनाता है। ग्रामीणों के मुताबिक यह परंपरा कोई नई नहीं है, बल्कि कई पीढ़ियों से चली आ रही है। लोग मंदिर में माथा टेकने के बाद पत्थरों पर प्रहार कर देवी का आशीर्वाद लेने की परंपरा निभाते हैं।

🙏 स्थानीय मान्यता

मान्यता है कि पत्थरों पर प्रहार करने से निकलने वाली आवाज मां वन देवी तक पहुंचती है और देवी अपने भक्तों की मनोकामनाएं सुनती हैं।

खास तौर पर ज्येष्ठ नवरात्र के दौरान यहां श्रद्धालुओं की संख्या काफी बढ़ जाती है। इस अवसर पर मेले का आयोजन भी किया जाता है। आसपास के गांवों के अलावा दूर-दराज के क्षेत्रों से भी लोग यहां पहुंचते हैं।

शादी-ब्याह में भी निभाई जाती है खास रस्म

कुसमीं पहाड़ी के वन देवी मंदिर की खासियत सिर्फ पत्थरों की रहस्यमयी आवाज तक सीमित नहीं है। स्थानीय समाज में इस मंदिर का संबंध विवाह और अन्य शुभ अवसरों से भी जुड़ा हुआ है।

गांव के बुजुर्गों के अनुसार, शादी के बाद नवविवाहित दूल्हा-दुल्हन को वन देवी के मंदिर में लाकर देवी का आशीर्वाद दिलाया जाता है। महिलाओं द्वारा निभाई जाने वाली ‘ककन’ की रस्म के दौरान इन पत्थरों पर डंडे से प्रहार करने की परंपरा भी बताई जाती है।

स्थानीय विश्वास के अनुसार इन पत्थरों से निकलने वाली आवाज नवविवाहित जोड़े के लिए सुख, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद लेकर आती है।

मान्यता है कि इन पत्थरों से निकलने वाली आवाज देवी को प्रसन्न करती है और नवविवाहित जोड़े के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है। इस वजह से स्थानीय लोगों के लिए मंदिर धार्मिक स्थल के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं का भी महत्वपूर्ण केंद्र है।

ग्रामीणों ने मिलकर बनवाया मंदिर

स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि पत्थरों के बीच स्थापित वन देवी की मूर्ति काफी पुरानी है। मंदिर के वर्तमान स्वरूप को तैयार करने में गांव के लोगों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। ग्रामीणों ने आपसी सहयोग और चंदा जुटाकर मंदिर का निर्माण कराया।

चितरंजन सिंह, गौरीशंकर सिंह, रामेश्वर सिंह, राम बदन सिंह, रामप्यारे सिंह, अयोध्या सिंह, विजय सिंह, अजय सिंह और हिमांशु सिंह समेत स्थानीय लोगों के अनुसार, मंदिर में लंबे समय से पूजा होती आ रही है और हर वर्ष यहां मेला आयोजित किया जाता है।

📌 मंदिर से जुड़ी प्रमुख बातें

  • मंदिर कुसमीं पहाड़ी के पास स्थित बताया जाता है।
  • वन देवी की मूर्ति को स्थानीय लोग प्राचीन मानते हैं।
  • मंदिर का निर्माण ग्रामीणों के सहयोग से हुआ।
  • ज्येष्ठ नवरात्र के दौरान यहां मेले की परंपरा बताई जाती है।
  • विवाह और शुभ अवसरों पर भी लोग देवी का आशीर्वाद लेने पहुंचते हैं।

मंदिर के प्रति लोगों की आस्था समय के साथ कम होने के बजाय और मजबूत हुई है। यही कारण है कि कुसमीं पहाड़ी आज आसपास के ग्रामीणों के लिए एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल बन गई है।

कभी घने जंगल से ढकी थी पहाड़ी

कुसमीं पहाड़ी से जुड़ी एक कहानी यहां की आस्था को और गहरा बनाती है। ग्रामीण बुजुर्गों के अनुसार, कई दशक पहले यह इलाका घने जंगल से घिरा हुआ था। पहाड़ी पर बड़ी संख्या में पेड़-पौधे मौजूद थे।

स्थानीय मान्यता के मुताबिक समय के साथ जंगल की अवैध कटाई शुरू हुई। इसके बाद मां वन देवी के प्रकट होने और पेड़ों को नुकसान पहुंचाने वालों को दंड मिलने की कहानी गांव में प्रचलित हुई। इस घटना के बाद लोगों ने पहाड़ी और उसके पेड़-पौधों को देवी का स्वरूप मानना शुरू कर दिया।

आज भी कई ग्रामीण पहाड़ी के पेड़-पौधों को नुकसान पहुंचाने से बचते हैं। उनके लिए कुसमीं पहाड़ी केवल जंगल या जमीन का एक हिस्सा नहीं, बल्कि देवी का धाम है।

आखिर क्यों बजते हैं ये पत्थर?

जहां श्रद्धालु इन पत्थरों से निकलने वाली आवाज को देवी की शक्ति से जोड़ते हैं, वहीं इसके पीछे वैज्ञानिक कारण होने की संभावना भी व्यक्त की जाती है।

🔬 वैज्ञानिक नजरिया

कुछ चट्टानों में विशेष प्रकार के खनिजों और धात्विक तत्वों की मौजूदगी के कारण उन्हें ठोकने पर सामान्य पत्थरों की तुलना में अलग और अधिक स्पष्ट ध्वनि उत्पन्न हो सकती है। कुछ लोगों का अनुमान है कि यहां मौजूद चट्टानों में लौह युक्त खनिजों की मात्रा इसकी वजह हो सकती है।

हालांकि केवल आवाज के आधार पर किसी पत्थर की संरचना या उसमें मौजूद खनिजों के बारे में निश्चित निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। इसके लिए भूवैज्ञानिक या वैज्ञानिक जांच की आवश्यकता होगी। इसलिए इस रहस्य का वैज्ञानिक कारण अभी शोध का विषय माना जा सकता है।

आस्था, परंपरा और रहस्य का अनोखा संगम

कुसमीं पहाड़ी का वन देवी मंदिर आज आस्था, लोकविश्वास, परंपरा और प्राकृतिक रहस्य का अनोखा संगम बन चुका है। यहां आने वाले श्रद्धालु जहां देवी के दर्शन कर अपनी मनोकामना पूरी होने की प्रार्थना करते हैं, वहीं पत्थरों से निकलने वाली धातु जैसी आवाज उनके लिए आकर्षण का केंद्र बनी रहती है।

विज्ञान इस घटना के पीछे खनिज संरचना या चट्टानों के भौतिक गुणों को संभावित कारण मान सकता है, लेकिन स्थानीय लोगों के लिए यह मां वन देवी की शक्ति और आशीर्वाद का प्रतीक है।

शायद यही वजह है कि कुसमीं पहाड़ी की पहचान केवल एक धार्मिक स्थल के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे स्थान के रूप में बन रही है जहां लोक आस्था और प्राकृतिक रहस्य एक साथ दिखाई देते हैं। आने वाले समय में यदि इन अनोखे पत्थरों का वैज्ञानिक अध्ययन होता है, तो संभव है कि इस रहस्य से जुड़े कई सवालों के जवाब भी सामने आएं।

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