जहां जाते ही भाई-बहन बन जाते हैं पति-पत्नी! 7 परिक्रमाओं से जुड़ी अनोखी मान्यता
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जहां जाते ही भाई-बहन बन जाते हैं पति-पत्नी! 7 परिक्रमाओं से जुड़ी है अनोखी मान्यता

रावण, कुंभकरण और मेघनाथ की विशाल प्रतिमाओं से जुड़ा यह स्थान अपनी अनोखी धार्मिक मान्यताओं के कारण लोगों के बीच चर्चा का विषय बना रहता है।

लंका मीनार और रावण से जुड़ी अनोखी धार्मिक मान्यता
लंका मीनार से जुड़ी स्थानीय मान्यताएं इसे एक अनोखा धार्मिक-सांस्कृतिक स्थल बनाती हैं।
खास बात: भारत में कई ऐसे स्थान हैं जहां सदियों पुरानी लोक मान्यताएं आज भी लोगों के बीच प्रचलित हैं। लंका मीनार से जुड़ी भाई-बहन की यह मान्यता भी ऐसी ही एक दिलचस्प परंपरा बताई जाती है।

भारत अपनी विविध संस्कृतियों, परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। देश के अलग-अलग हिस्सों में ऐसे कई स्थान हैं, जहां सदियों पुरानी परंपराएं आज भी लोगों के जीवन का हिस्सा बनी हुई हैं। कुछ मान्यताएं इतनी अनोखी हैं कि उनके बारे में सुनकर लोग हैरान रह जाते हैं। ऐसी ही एक दिलचस्प मान्यता लखनऊ के पास स्थित लंका मीनार को लेकर बताई जाती है।

कहा जाता है कि इस मीनार पर भाई और बहन एक साथ ऊपर नहीं जा सकते। इसके पीछे वजह भी बेहद अनोखी बताई जाती है। मान्यता के अनुसार, मीनार के ऊपर पहुंचने के लिए सात परिक्रमाएं करनी पड़ती हैं और हिंदू विवाह परंपरा में सात फेरों का संबंध पति-पत्नी के रिश्ते से माना जाता है। यही कारण बताया जाता है कि भाई-बहन को यहां एक साथ ऊपर जाने से रोका जाता है।

रावण और उसके परिवार से जुड़ा है यह स्थान

लंका मीनार को लेकर सबसे ज्यादा आकर्षण इसकी रामायण से जुड़ी मान्यताओं को लेकर है। स्थानीय परंपरा में इसे रावण और उसके परिवार से जोड़ा जाता है। यहां रावण के साथ उसके परिवार के सदस्यों की विशाल प्रतिमाएं भी स्थापित होने की बात कही जाती है।

बताया जाता है कि यहां कुंभकरण और मेघनाथ की विशाल मूर्तियां लोगों के आकर्षण का केंद्र हैं। कुंभकरण की मूर्ति करीब 100 फीट और मेघनाथ की मूर्ति करीब 65 फीट ऊंची बताई जाती है। इन विशाल प्रतिमाओं को देखने के लिए दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं।

🛕 यहां क्या-क्या देखने को मिलता है?
  • रावण और उसके परिवार से जुड़ी मान्यताएं
  • करीब 100 फीट ऊंची कुंभकरण की प्रतिमा
  • करीब 65 फीट ऊंची मेघनाथ की प्रतिमा
  • भगवान शिव और चित्रगुप्त की प्रतिमाएं
  • करीब 180 फीट लंबी नाग देवता की प्रतिमा होने का दावा

यह स्थान सिर्फ रावण और उसके परिवार की वजह से ही खास नहीं माना जाता। यहां भगवान शिव और चित्रगुप्त की प्रतिमाओं के साथ नाग देवता की विशाल प्रतिमा भी आकर्षण का केंद्र बताई जाती है। नाग देवता की प्रतिमा करीब 180 फीट लंबी होने का दावा किया जाता है।

रावण को क्यों माना जाता है शिव भक्त?

रामायण की परंपराओं में रावण को भगवान शिव का महान भक्त माना गया है। धार्मिक कथाओं के अनुसार, रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की थी। इसी वजह से रावण से जुड़े कई स्थानों पर भगवान शिव की पूजा और उनसे जुड़ी धार्मिक मान्यताएं भी देखने को मिलती हैं।

लंका मीनार से जुड़ी स्थानीय मान्यता में भी रावण के शिव भक्त होने को एक महत्वपूर्ण कारण के रूप में देखा जाता है। हालांकि, ऐसी मान्यताओं और उनके ऐतिहासिक प्रमाणों को अलग-अलग समझना जरूरी है। स्थानीय लोगों की आस्था और परंपराएं किसी स्थान की सांस्कृतिक पहचान बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

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परिक्रमाओं से जुड़ी है मान्यता
स्थानीय मान्यता में सात परिक्रमाओं को विवाह के सात फेरों से जोड़कर देखा जाता है।

सबसे ज्यादा चर्चा में रहती है भाई-बहन वाली मान्यता

लंका मीनार की सबसे अनोखी मान्यता भाई-बहन के एक साथ ऊपर जाने से जुड़ी बताई जाती है।

स्थानीय लोगों के अनुसार, मीनार के ऊपर जाने के रास्ते में सात परिक्रमाएं करनी पड़ती हैं। हिंदू विवाह संस्कार में वर-वधू द्वारा अग्नि के चारों ओर लिए जाने वाले सात फेरे पति-पत्नी के वैवाहिक संबंध का प्रतीक माने जाते हैं।

इसी धार्मिक प्रतीक से इस मीनार की परिक्रमा को जोड़कर एक मान्यता विकसित हुई कि भाई और बहन को एक साथ सात परिक्रमाएं नहीं करनी चाहिए।

“यह मान्यता मुख्य रूप से स्थानीय धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा के रूप में बताई जाती है, न कि किसी सामान्य धार्मिक नियम के रूप में।”

क्या सच में भाई-बहन यहां पति-पत्नी माने जाते हैं?

यह बात सुनने में जितनी चौंकाने वाली लगती है, वास्तविक मान्यता को उसी अर्थ में समझना सही नहीं होगा। भाई-बहन का रिश्ता भाई-बहन का ही रहता है। यहां सात परिक्रमाओं को विवाह के सात फेरों से जोड़ने के कारण एक प्रतीकात्मक मान्यता बनी हुई है।

यानी यह कहना कि मीनार पर जाने के बाद भाई-बहन वास्तव में पति-पत्नी बन जाते हैं, एक अतिशयोक्तिपूर्ण या लोकप्रचलित तरीके से कही जाने वाली बात है। इसके पीछे मुख्य रूप से स्थानीय आस्था और परंपरा जुड़ी हुई है।

ℹ️ जरूरी स्पष्टीकरण

भाई-बहन के मीनार पर एक साथ ऊपर न जाने की बात को स्थानीय धार्मिक-सांस्कृतिक मान्यता के रूप में समझना चाहिए। इसे कानूनी प्रतिबंध या सभी हिंदुओं पर लागू होने वाले धार्मिक नियम के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए।

आज भी कायम है वर्षों पुरानी परंपरा

भारत में धार्मिक स्थलों से जुड़ी कई परंपराएं लिखित नियमों से ज्यादा लोकविश्वास और सामाजिक व्यवहार के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती हैं। लंका मीनार से जुड़ी यह मान्यता भी इसी तरह की परंपरा के रूप में देखी जाती है।

कुछ लोगों के लिए यह आस्था का विषय है, तो कुछ इसे भारत की अनोखी लोक-संस्कृति का हिस्सा मानते हैं। पर्यटकों के लिए यहां की विशाल प्रतिमाएं, धार्मिक वातावरण और इससे जुड़ी कहानियां विशेष आकर्षण पैदा करती हैं।

रावण, कुंभकरण और मेघनाथ की विशाल प्रतिमाओं से लेकर भगवान शिव और नाग देवता से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं तक, यह स्थान अपने भीतर कई अलग-अलग कथाओं और लोकविश्वासों को समेटे हुए है।

सबसे दिलचस्प बात यही है कि एक ही जगह पर इतिहास, धार्मिक आस्था, लोककथा और परंपरा आपस में मिलते हुए दिखाई देते हैं। भाई-बहन के साथ सात परिक्रमा न करने की मान्यता भी इसी सांस्कृतिक विरासत का एक अनोखा उदाहरण है।

इसलिए अगर कभी इस जगह की यात्रा करें तो वहां प्रचलित मान्यताओं को समझना और उनका सम्मान करना जरूरी है। साथ ही, लोकमान्यताओं को ऐतिहासिक तथ्य या धार्मिक नियम के रूप में प्रस्तुत करने से पहले उनके प्रमाणों की पुष्टि करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। एक नई सोच, एक नई दिशा और एक नई सुबह के साथ

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