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पिता ने बेटियों से मिलने की चाहत में तोड़ा दम, अंतिम दर्शन के लिए भी नहीं पहुंचीं बेटियां

सोनीपत के वृद्ध आश्रम में हुई एक बुजुर्ग की मौत ने रिश्तों, आधुनिक जीवनशैली और बदलते सामाजिक मूल्यों पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जब बच्चों के पास अपने माता-पिता के अंतिम दर्शन के लिए भी समय नहीं हो, तो सवाल सिर्फ एक परिवार पर नहीं बल्कि पूरे समाज की सोच और संवेदनाओं पर उठता है।

समाज किस दिशा में जा रहा है? आज के दौर में यह सवाल पहले से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। आधुनिक जीवन की भागदौड़, करियर की चिंता और व्यक्तिगत जिम्मेदारियों के बीच परिवार और रिश्तों के लिए समय लगातार कम होता जा रहा है। हरियाणा के सोनीपत से सामने आया एक मामला इसी बदलती सामाजिक तस्वीर पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

सोनीपत के एक वृद्ध आश्रम में रह रहे बुजुर्ग कपड़ा व्यापारी शिवचरण रतन गुप्ता की मृत्यु के बाद उनके अंतिम संस्कार में उनकी तीनों बेटियां शामिल नहीं हुईं। यह घटना इसलिए भी बेहद भावुक कर देने वाली है क्योंकि बताया जाता है कि शिवचरण गुप्ता ने अपनी बेटियों को पढ़ाने-लिखाने और उन्हें कामयाब बनाने के लिए जीवन भर मेहनत की थी।

बेटियों को पढ़ाया-लिखाया, लेकिन अंतिम समय में रह गए अकेले

जानकारी के अनुसार महाराष्ट्र के रहने वाले शिवचरण गुप्ता कभी बड़े कपड़ा व्यापारी थे। करीब डेढ़ वर्ष पहले वह अपनी पत्नी मीना गुप्ता के साथ सोनीपत के वृद्ध आश्रम में रहने लगे थे। उनका कोई बेटा नहीं था। उनकी तीन बेटियां ही उनके परिवार की सबसे बड़ी उम्मीद थीं।

शिवचरण गुप्ता ने अपनी तीनों बेटियों—अनिता, निशा और प्रिया—को पढ़ाया-लिखाया। इनमें से दो बेटियों के अध्यापिका होने की जानकारी सामने आई है। उनकी पत्नी मीना गुप्ता का पहले ही निधन हो चुका था। पत्नी के जाने के बाद वृद्ध पिता के लिए बेटियों का साथ और भी महत्वपूर्ण हो गया था।

लेकिन जिंदगी के आखिरी पड़ाव में शिवचरण गुप्ता को अपनी बेटियों का इंतजार ही करना पड़ा। उनकी तबीयत खराब हुई तो वृद्ध आश्रम के संचालक ने बेटियों को इसकी सूचना दी।

“एक पिता अपनी बेटियों से मिलने की इच्छा लेकर दुनिया से चला गया, लेकिन बेटियां उसके अंतिम दर्शन के लिए भी नहीं पहुंच सकीं।”

बीमारी की सूचना के बाद भी नहीं पहुंचीं बेटियां

वृद्ध आश्रम के संचालक आनंद कुमार के मुताबिक, शिवचरण गुप्ता की बीमारी की सूचना उनकी तीनों बेटियों को करीब 20 दिन पहले दे दी गई थी। आश्रम संचालक का कहना है कि बेटियों से बात करने के लिए शिवचरण अपने पास मोबाइल फोन रखते थे और उनसे बातचीत किया करते थे।

बीमारी बढ़ने के बाद बेटियों के फोन आने कम हो गए। आश्रम की ओर से जब दोबारा उनकी गंभीर स्थिति के बारे में बताया गया, तब भी बेटियां पिता से मिलने नहीं पहुंचीं।

देर रात जब शिवचरण गुप्ता की मृत्यु हो गई तो आश्रम की ओर से बेटियों को फिर सूचना दी गई। बताया गया कि यदि वे आना चाहती हैं तो अंतिम संस्कार से पहले शव को रखा जा सकता है। लेकिन कथित तौर पर समय नहीं होने की बात कही गई।

मोबाइल स्क्रीन पर दिखा पिता का चेहरा, मुंह से निकला सिर्फ “पापा”

घटना का सबसे भावुक पहलू वह था जब बेटियों को मोबाइल के माध्यम से उनके पिता का बेजान चेहरा दिखाया गया। आश्रम संचालक के अनुसार, उस समय बेटी के मुंह से सिर्फ एक शब्द निकला—“पापा”

यह एक छोटा सा शब्द था, लेकिन उसमें वर्षों का रिश्ता, बचपन की यादें और पिता का स्नेह समाया हुआ था। इसके बावजूद बेटियां अंतिम दर्शन के लिए स्वयं आश्रम नहीं पहुंच सकीं।

“अभी और कितना टाइम लगेगा?”

आश्रम संचालक के अनुसार, अंतिम संस्कार की प्रक्रिया शुरू होने के दौरान फोन पर बेटी ने पूछा कि अभी कितना समय लगेगा। जब बताया गया कि मुखाग्नि दी जा चुकी है और करीब 10-15 मिनट में प्रक्रिया पूरी हो जाएगी, तो बेटी ने अंतिम संस्कार की वीडियो भेजने के लिए कहा।

बेटियों ने वीडियो कॉल के माध्यम से अंतिम संस्कार देखा। बड़ी बेटी अनीता ने ऑनलाइन 5100 रुपये भेजकर पिता का अंतिम संस्कार ठीक से कराने की बात कही।

पहले बेटियों की ओर से पिता की अस्थियां सुरक्षित रखने की बात कही गई थी। बाद में कथित तौर पर समय की कमी के चलते उन्होंने आश्रम संचालक से ही अस्थियां गंगा में प्रवाहित करने का आग्रह किया।

“रिश्तों की कीमत सिर्फ पैसे से नहीं, समय और अपनापन देने से तय होती है।”

कहां रहती हैं तीनों बेटियां?

सामने आई जानकारी के अनुसार शिवचरण गुप्ता की बड़ी बेटी अनीता नेपाल में रहती हैं और वहां अध्यापिका हैं। उनसे छोटी बेटी निशा उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में रहती हैं, जबकि सबसे छोटी बेटी प्रिया मुंबई में रहती हैं।

तीनों बेटियां अपने-अपने जीवन में आगे बढ़ चुकी हैं। लेकिन पिता की मृत्यु के बाद उनके अंतिम संस्कार में शारीरिक रूप से शामिल न होने की घटना ने समाज के सामने रिश्तों की प्राथमिकताओं को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

सबसे बड़ा सवाल क्या है?

क्या आधुनिक जीवन की व्यस्तता इतनी बढ़ गई है कि माता-पिता के लिए कुछ घंटे निकालना भी मुश्किल हो गया है?

क्या सफलता का अर्थ केवल अच्छी नौकरी, पैसा और सुविधाएं हासिल करना रह गया है?

और क्या हम बच्चों को शिक्षा तो दे रहे हैं, लेकिन रिश्तों और जिम्मेदारियों का संस्कार देना भूलते जा रहे हैं?

सिर्फ बेटियों को दोष देना भी सही नहीं

इस घटना पर चर्चा करते समय एक बात समझना भी जरूरी है कि किसी एक मामले के आधार पर सभी बेटियों या बच्चों को कठघरे में खड़ा नहीं किया जा सकता। हर परिवार की अपनी परिस्थितियां होती हैं और सार्वजनिक रूप से सामने आई जानकारी हमेशा पूरी तस्वीर नहीं बताती।

लेकिन यदि सामने आई जानकारी सही है, तो यह घटना निश्चित रूप से समाज को आत्ममंथन का अवसर देती है। माता-पिता की जिम्मेदारी केवल आर्थिक जरूरतों को पूरा करना नहीं है और बच्चों की जिम्मेदारी भी केवल आर्थिक मदद तक सीमित नहीं होनी चाहिए।

माता-पिता को चाहिए पैसा नहीं, अपनापन

शिवचरण गुप्ता ने अपनी बेटियों को सफल बनाने में अपने जीवन का बड़ा हिस्सा लगा दिया। उन्होंने उन्हें शिक्षा दी, आगे बढ़ने का अवसर दिया और अपने सामर्थ्य के अनुसार उनका भविष्य बनाने की कोशिश की।

लेकिन उम्र के आखिरी पड़ाव पर माता-पिता को अक्सर बड़ी संपत्ति या महंगे उपहारों की जरूरत नहीं होती। उन्हें जरूरत होती है अपने बच्चों के साथ की, कुछ देर की बातचीत की और उस भरोसे की कि उनके बच्चे उनके साथ हैं।

इस घटना से समाज को क्या सीख मिलती है?

बच्चों को पढ़ाना और उन्हें सफल बनाना जरूरी है, लेकिन उनके भीतर संवेदनशीलता और पारिवारिक जिम्मेदारी का भाव पैदा करना भी उतना ही जरूरी है।

आज के माता-पिता और बच्चों दोनों को यह समझने की जरूरत है कि जीवन की व्यस्तता कभी खत्म नहीं होती। काम, नौकरी और जिम्मेदारियां हमेशा रहेंगी, लेकिन माता-पिता के साथ बिताया समय वापस नहीं आता।

इसलिए जब तक माता-पिता हमारे साथ हैं, उनसे बात कीजिए, उनके पास बैठिए और उन्हें यह महसूस कराइए कि वे आपके लिए महत्वपूर्ण हैं।

“अंतिम दर्शन का अवसर हर किसी को दोबारा नहीं मिलता।”

शिवचरण गुप्ता की अंतिम यात्रा उनके परिवार और समाज के लिए कई सवाल छोड़ गई है। यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि आधुनिकता और सफलता की दौड़ में कहीं हम अपने सबसे जरूरी रिश्तों को तो पीछे नहीं छोड़ रहे।

रिश्ते केवल खून से नहीं चलते, उन्हें समय, संवेदना और अपनापन भी चाहिए। माता-पिता ने हमारे बचपन में हमारे लिए अपना समय दिया था। शायद जीवन का सबसे बड़ा संस्कार यही है कि जब उन्हें हमारी जरूरत हो, तब हम उनके लिए समय निकाल सकें।