राइजिंग भारत: ज्ञान, विचार और राष्ट्रीय चरित्र की शक्ति पर इंदौर में मंथन
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राष्ट्रीय संगोष्ठी · इंदौर

राइजिंग भारत: ज्ञान, विचार और राष्ट्रीय चरित्र की शक्ति पर इंदौर में मंथन

डेली कॉलेज में “द राइजिंग भारत – ज्ञानं परम बलम्” विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी, 600 से अधिक पीएचडी धारकों सहित शिक्षाविदों और विशेषज्ञों ने लिया हिस्सा

इंदौर। भारत की सभ्यता, ज्ञान परंपरा और बदलती वैश्विक भूमिका को लेकर इंदौर के ऐतिहासिक डेली कॉलेज में शनिवार को एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। वर्ल्ड एसोसिएशन ऑफ हिंदू एकेडिमिशियंस की ओर से आयोजित इस एक दिवसीय कार्यक्रम का विषय था— “द राइजिंग भारत – ज्ञानं परम बलम्”

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600+ पीएचडी धारक देशभर से शिक्षाविद और शोधकर्ता शामिल
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ज्ञान और विचार भारत की बौद्धिक शक्ति पर मंथन
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राष्ट्रीय चरित्र वैचारिक चुनौतियों से निपटने पर जोर

संगोष्ठी में देशभर से आए 600 से अधिक पीएचडी धारकों के साथ शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं, विचारकों और नीति विशेषज्ञों ने भाग लेकर भारत के भविष्य और उसकी वैचारिक दिशा पर व्यापक चर्चा की। कार्यक्रम का केंद्र केवल भारत की उपलब्धियों का उल्लेख करना नहीं था, बल्कि यह समझना भी था कि तेजी से बदलती दुनिया में भारत अपनी ज्ञान परंपरा, सांस्कृतिक मूल्यों और राष्ट्रीय चरित्र को किस तरह मजबूत कर सकता है।

अलग-अलग सत्रों में भारतीय समाज, महिला नेतृत्व, जनजातीय संस्कृति और वैश्विक अर्थव्यवस्था जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श हुआ। विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों ने अपने अनुभव और विचार साझा किए तथा भारत की बदलती भूमिका को व्यापक दृष्टिकोण से समझने का प्रयास किया।

भारत के वैश्विक नेतृत्व की संभावना

संगोष्ठी के मुख्य वक्ता विश्व हिंदू परिषद के अखिल भारतीय संगठन मंत्री मिलिंद परांडे रहे। उन्होंने अपने संबोधन में भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा और भविष्य की संभावनाओं पर जोर दिया। उन्होंने महर्षि अरविंद के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत की भूमिका केवल अपने विकास तक सीमित नहीं है, बल्कि वह दुनिया को दिशा देने की क्षमता रखता है।

“भारत की प्रगति के साथ राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण भी आवश्यक है।”

— संगोष्ठी में व्यक्त विचार

परांडे ने कहा कि भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन आर्थिक और तकनीकी प्रगति के साथ-साथ समाज के भीतर मजबूत राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण भी आवश्यक है। उनके अनुसार आज देश के सामने अनेक वैचारिक चुनौतियां मौजूद हैं और इनसे निपटने के लिए केवल संस्थागत प्रयास पर्याप्त नहीं होंगे। समाज के प्रत्येक वर्ग में जिम्मेदारी, अनुशासन, राष्ट्रबोध और सकारात्मक दृष्टिकोण को मजबूत करना जरूरी है।

उनके वक्तव्य में यह विचार प्रमुख रहा कि ज्ञान किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति हो सकता है। भारत यदि अपनी शिक्षा, शोध और बौद्धिक क्षमता को सामाजिक मूल्यों के साथ जोड़कर आगे बढ़ाता है, तो वह वैश्विक मंच पर और अधिक प्रभावशाली भूमिका निभा सकता है।

भारतीय चिंतन में नारी की भूमिका

महिला सत्र में भारतीय परंपरा पर चर्चा

संगोष्ठी का महिला सत्र भी विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। इस सत्र में डॉ. नूपुर निखिल ने भारतीय चिंतन पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में नारी को केवल परिवार की जिम्मेदारियों तक सीमित करके नहीं देखा गया, बल्कि उसे समाज और संस्कृति के निर्माण की महत्वपूर्ण शक्ति माना गया है।

उन्होंने भारतीय इतिहास और परंपरा में महिलाओं की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि महिलाएं लंबे समय से सामाजिक, आर्थिक, प्रशासनिक और वैचारिक क्षेत्रों में योगदान देती रही हैं। आधुनिक भारत में भी महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है और उन्हें राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में समान रूप से महत्वपूर्ण भूमिका निभानी चाहिए।

महिला सत्र में इस बात पर भी जोर रहा कि भारतीय समाज की प्रगति को समझने के लिए उसकी पारंपरिक सामाजिक संरचनाओं और महिलाओं के योगदान को व्यापक दृष्टि से देखना आवश्यक है।

जनजातीय संस्कृति पर गंभीर विमर्श

संगोष्ठी के जनजातीय सत्र में प्रकाश उइके और लक्ष्मण सिंह मरकाम ने जनजातीय समाज की सांस्कृतिक पहचान और उसके सामने मौजूद चुनौतियों पर विचार व्यक्त किए। चर्चा में जनजातीय समुदायों की परंपराओं, लोकज्ञान और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।

वक्ताओं ने माना कि भारत की विविधता उसकी सबसे बड़ी ताकतों में से एक है। जनजातीय समाज की संस्कृति, लोक परंपराएं और प्रकृति के साथ उसका संबंध भारतीय सभ्यता की व्यापक तस्वीर का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इसलिए विकास की प्रक्रिया में जनजातीय समुदायों की पहचान और परंपराओं को साथ लेकर चलना जरूरी होगा।

वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बदलते समीकरण

बदलते आर्थिक परिदृश्य पर संवाद

कार्यक्रम में अर्थव्यवस्था और वैश्विक बाजार से जुड़े सत्र में प्रफुल्ल केतकर और जितेंद्र गुप्ता ने बदलते आर्थिक परिदृश्य पर संवाद किया। इस सत्र में भारत की अर्थव्यवस्था, वैश्विक बाजार में बढ़ती भूमिका और बदलती आर्थिक परिस्थितियों पर विचार किया गया।

वक्ताओं ने इस बात पर चर्चा की कि वैश्विक स्तर पर आर्थिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। ऐसे समय में भारत के लिए आत्मविश्वास के साथ अपनी आर्थिक क्षमता को विकसित करना, शोध और नवाचार को बढ़ावा देना तथा वैश्विक अवसरों का प्रभावी उपयोग करना महत्वपूर्ण होगा।

कई गणमान्य हस्तियों की मौजूदगी

संगोष्ठी में विभिन्न क्षेत्रों से जुड़ी कई प्रमुख हस्तियां मौजूद रहीं। इनमें संत ओमानंद महाराज, उद्योगपति विनोद अग्रवाल, पद्मश्री कालूराम बामनिया, भालचंद्र दत्तात्रेय मोंढे, डॉ. राकेश सिंघई, डॉ. राजेश चावला और विक्रम सिंह पवार सहित अनेक गणमान्य नागरिक शामिल रहे।

कार्यक्रम में मौजूद प्रमुख हस्तियां

शिक्षा, संस्कृति, उद्योग और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े कई प्रमुख लोगों ने संगोष्ठी में सहभागिता की और विभिन्न विषयों पर आयोजित चर्चाओं को महत्वपूर्ण बनाया।

संत ओमानंद महाराज विनोद अग्रवाल पद्मश्री कालूराम बामनिया भालचंद्र दत्तात्रेय मोंढे डॉ. राकेश सिंघई डॉ. राजेश चावला विक्रम सिंह पवार

ज्ञान से राष्ट्रीय चरित्र तक

“द राइजिंग भारत – ज्ञानं परम बलम्” का संदेश संगोष्ठी के विभिन्न सत्रों में अलग-अलग रूपों में सामने आया। चर्चा का मूल विचार यही रहा कि भारत का भविष्य केवल आर्थिक विकास से नहीं, बल्कि ज्ञान, शोध, संस्कृति, सामाजिक जिम्मेदारी और मजबूत राष्ट्रीय चरित्र से भी तय होगा।

इंदौर में आयोजित यह संगोष्ठी इस दृष्टि से महत्वपूर्ण रही कि इसमें भारत के अतीत की परंपराओं और भविष्य की संभावनाओं को एक साथ देखने का प्रयास किया गया। वक्ताओं और प्रतिभागियों ने शिक्षा एवं ज्ञान को राष्ट्र निर्माण का आधार मानते हुए इस बात पर जोर दिया कि बदलती दुनिया में भारत को अपनी बौद्धिक क्षमता और सांस्कृतिक आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ना होगा।

संगोष्ठी का व्यापक संदेश

पूरे आयोजन से यह संदेश सामने आया कि भारत की शक्ति केवल उसकी आर्थिक क्षमता में नहीं, बल्कि उसकी ज्ञान परंपरा, सामाजिक विविधता, सांस्कृतिक विरासत और बौद्धिक सामर्थ्य में भी निहित है। इन सभी क्षेत्रों को आधुनिक शोध, शिक्षा और नवाचार से जोड़कर भारत अपनी वैश्विक भूमिका को और मजबूत कर सकता है।

उभरता हुआ भारत केवल एक आर्थिक शक्ति नहीं, बल्कि ज्ञान, विचार और मानवीय मूल्यों के आधार पर वैश्विक नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ता राष्ट्र हो सकता है।

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