7 दिन पहले सेमरा में जलेगी दिवाली की ज्योति, 40 गांव देखेंगे अनोखी परंपरा

7 दिन पहले सेमरा में जलेगी दिवाली की ज्योति, 40 गांव देखेंगे अनोखी परंपरा

सिरदार देव के सामने थम जाता है पंचांग भी: सेमरा में 7 दिन पहले दिवाली | Vardat News
VARDAT NEWS | विशेष रिपोर्ट | छत्तीसगढ़
धर्म एवं संस्कृति

सिरदार देव के सामने थम जाता है पंचांग भी: 7 दिन पहले सेमरा में जलेगी दिवाली की ज्योति, 40 गांव देखेंगे अनोखी परंपरा

देशभर में दीपावली की तैयारियों के बीच धमतरी जिले का सेमरा गांव अपनी सदियों पुरानी मान्यता के अनुसार सात दिन पहले मनाता है दीपोत्सव। सिरदार देव की परंपरा से जुड़ी है इस अनोखी दिवाली की कहानी।

सिरदार देव की अनोखी परंपरा
सात दिन पहले रोशन होगा सेमरा गांव
🪔 आस्था की रोशनी, विरासत की पहचान 🪔

धमतरी (छत्तीसगढ़)। जब देशभर में लोग दीपावली की तैयारियों में जुटे हैं और पंचांग के अनुसार त्योहार की तारीख का इंतजार कर रहे हैं, तब छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले का एक गांव अपनी सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार सात दिन पहले ही दीपोत्सव मनाने की तैयारी कर रहा है। यहां त्योहारों की तारीख सामान्य कैलेंडर या पंचांग से नहीं, बल्कि ग्राम देवता सिरदार देव की परंपरा और ग्रामीणों की अटूट आस्था से तय होती है।

धमतरी जिले की भखारा तहसील के ग्राम सेमरा (सि) में इस बार 3 नवंबर की रात महालक्ष्मी का आह्वान होगा। इसके अगले दिन यानी 4 नवंबर को गोवर्धन पूजा के साथ गांव में उत्सव का रंग और गहरा हो जाएगा। दीपों की रोशनी, लोकगीतों की मधुर धुन, मांदर की थाप और गौरा-गौरी की पारंपरिक पूजा के बीच पूरा गांव उत्सव में डूब जाएगा।

इस अनोखी परंपरा को देखने और इसका हिस्सा बनने के लिए केवल सेमरा ही नहीं, बल्कि धमतरी और पड़ोसी बालोद जिले के करीब 40 गांवों के लोग भी पहुंचते हैं। यही वजह है कि सेमरा की दिवाली आसपास के पूरे क्षेत्र में विशेष आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।

🪔 सेमरा की दिवाली क्यों है खास?

यहां दीपावली सामान्य तारीख से लगभग सात दिन पहले मनाई जाती है। ग्रामीणों के अनुसार, इसकी वजह ग्राम देवता सिरदार देव से जुड़ी सदियों पुरानी परंपरा और आस्था है।

पंचांग से नहीं, सिरदार देव की परंपरा से तय होते हैं त्योहार

सेमरा गांव की पहचान केवल अपनी भौगोलिक स्थिति या आबादी से नहीं है, बल्कि यहां की विशिष्ट धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा से भी है। लगभग 1200 की आबादी वाले इस गांव में सदियों से एक ऐसी मान्यता चली आ रही है, जो इसे देश के दूसरे गांवों से अलग बनाती है।

ग्रामीणों के अनुसार, बहुत पहले सिरदार नाम के एक संत और बुजुर्ग ने यहां आकर निवास किया था। उनके प्रति गांव के लोगों की गहरी श्रद्धा रही है। मान्यता है कि उन्होंने गांव को किसी बड़ी दैवीय विपदा और अनहोनी से सुरक्षित रखने के उद्देश्य से पर्व-त्योहार निर्धारित समय से पहले मनाने की परंपरा शुरू की थी।

समय गुजरता गया, पीढ़ियां बदलती गईं, लेकिन सिरदार देव के प्रति ग्रामीणों की आस्था कम नहीं हुई। आज भी गांव में कोई बड़ा त्योहार मनाने से पहले सिरदार देव के थान में पूजा-अर्चना की जाती है। उनकी अनुमति और परंपरागत रीति के बाद ही उत्सव की शुरुआत होती है।

ग्रामीणों का विश्वास है कि सिरदार देव की यह परंपरा गांव के सुख, शांति और समृद्धि से जुड़ी हुई है। इसी विश्वास के कारण यहां सामान्य पंचांग से अलग त्योहार मनाने की परंपरा आज भी जीवित है।

दिवाली ही नहीं, होली और हरेली भी मनाई जाती है पहले

सेमरा की यह विशेषता केवल दीपावली तक सीमित नहीं है। यहां होली, हरेली और पोला जैसे प्रमुख पर्व भी आसपास के गांवों की तुलना में लगभग एक सप्ताह पहले मनाए जाते हैं।

गांव के लोग बताते हैं कि इस परंपरा में हर पर्व का अपना धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। सबसे पहले ग्राम देवता के स्थान पर पूजा होती है। इसके बाद पूरे गांव में त्योहार की तैयारियां शुरू होती हैं।

हालांकि इस परंपरा में एक दिलचस्प बात यह भी है कि धनतेरस और नरक चतुर्दशी गांव में देश के अन्य हिस्सों की तरह ही मनाई जाती हैं, जबकि लक्ष्मी पूजा और गोवर्धन पूजा पहले संपन्न होती हैं।

इस तरह सेमरा की दिवाली केवल तारीखों का अंतर नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण समाज की सामूहिक आस्था और पूर्वजों से मिली विरासत का प्रतीक बन चुकी है।

मांदर की थाप पर थिरकेगा गांव, लोककलाकार बिखेरेंगे रंग

इस बार सेमरा में आयोजित होने वाला दीपोत्सव सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिहाज से भी खास रहने वाला है। 3 नवंबर की रात गौरा जागरण का आयोजन किया जाएगा। इस अवसर पर राजनांदगांव के भकुरा से आने वाली प्रसिद्ध चंपा बासन नाच पार्टी के कलाकार अपनी लोककला का प्रदर्शन करेंगे।

छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोकसंस्कृति में गौरा जागरण का विशेष स्थान है। इसमें लोकगीतों, संगीत और पारंपरिक नृत्य के माध्यम से धार्मिक आस्था की अभिव्यक्ति होती है। मांदर की थाप और लोकधुनों के बीच पूरी रात उत्सव का माहौल बना रहता है।

🎭 सेमरा दीपोत्सव के प्रमुख कार्यक्रम

3 नवंबर की रात — गौरा जागरण

राजनांदगांव के भकुरा की प्रसिद्ध चंपा बासन नाच पार्टी की सांस्कृतिक प्रस्तुति।

4 नवंबर — गोवर्धन पूजा

कबीरधाम के लखनपुर की मया के अंचरा नाच पार्टी की लोकनृत्य प्रस्तुति।

वहीं 4 नवंबर को गोवर्धन पूजा के अवसर पर कबीरधाम जिले के लखनपुर की प्रसिद्ध मया के अंचरा नाच पार्टी अपनी प्रस्तुति देगी। इस कार्यक्रम के माध्यम से छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति, परंपराओं और ग्रामीण जीवन की झलक देखने को मिलेगी।

आयोजकों और ग्रामीणों को उम्मीद है कि इस बार भी बड़ी संख्या में लोग इन कार्यक्रमों में शामिल होंगे। आसपास के गांवों से आने वाले दर्शकों के कारण सेमरा का यह आयोजन एक बड़े सांस्कृतिक मिलन का रूप ले लेता है।

40 गांवों के लोगों के लिए आस्था और उत्सव का केंद्र

सेमरा की अनोखी दिवाली का आकर्षण केवल गांव की सीमाओं तक नहीं रहता। धमतरी जिले के साथ-साथ पड़ोसी बालोद जिले के करीब 40 गांवों के लोग इस उत्सव को देखने पहुंचते हैं।

यहां आने वाले लोगों के लिए यह आयोजन सिर्फ दीपावली मनाने का अवसर नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की ग्रामीण संस्कृति को करीब से जानने और अपनी परंपराओं से जुड़ने का मौका भी है।

ऐसे आयोजनों में गांव के बुजुर्ग अपनी पुरानी मान्यताओं और परंपराओं की जानकारी नई पीढ़ी को देते हैं। बच्चे और युवा पारंपरिक पूजा-पद्धति, लोकनृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से अपनी जड़ों को पहचानते हैं।

आज जब आधुनिक जीवनशैली के कारण कई पारंपरिक लोककलाएं और ग्रामीण रीति-रिवाज धीरे-धीरे पीछे छूट रहे हैं, तब सेमरा का यह आयोजन सांस्कृतिक विरासत को बचाए रखने की एक मिसाल प्रस्तुत करता है।

युवा पीढ़ी भी संभाल रही है परंपरा की जिम्मेदारी

किसी भी परंपरा का लंबे समय तक जीवित रहना तभी संभव है, जब नई पीढ़ी भी उसे अपनाए। सेमरा गांव में इस दिशा में सकारात्मक प्रयास दिखाई देते हैं। यहां के युवा भी सिरदार देव से जुड़ी मान्यताओं और त्योहारों की अनूठी परंपरा को आगे बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

गांव के सरपंच छबिलेश सिन्हा, पूर्व सरपंच सुधीर बल्लाल, कामता निषाद, उमेश देवांगन, गजेंद्र सिन्हा, चंद्रहास सिन्हा, पंडित ओमप्रकाश तिवारी, यशवंत शुक्ला और घनश्याम देवांगन सहित अन्य ग्रामीण इस परंपरा को अपनी सांस्कृतिक पहचान मानते हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि यह केवल त्योहार मनाने की एक अलग तारीख नहीं है, बल्कि उनके पूर्वजों की अमूल्य धरोहर है। सिरदार देव के प्रति श्रद्धा और विश्वास ने पूरे गांव को एक सूत्र में बांध रखा है।

आस्था, संस्कृति और विरासत की अनूठी मिसाल है सेमरा

सेमरा की सात दिन पहले मनाई जाने वाली दिवाली यह बताती है कि भारत की सांस्कृतिक विविधता केवल बड़े धार्मिक आयोजनों और प्रसिद्ध तीर्थस्थलों तक सीमित नहीं है। देश के छोटे-छोटे गांवों में भी ऐसी परंपराएं मौजूद हैं, जिनके पीछे सदियों का इतिहास, लोकविश्वास और सामुदायिक जीवन जुड़ा हुआ है।

यहां दीपावली की रोशनी केवल घरों और गलियों को ही रोशन नहीं करती, बल्कि पूर्वजों की स्मृतियों और नई पीढ़ी के सांस्कृतिक जुड़ाव को भी जीवित रखती है।

एक ओर पूरा देश अपने पंचांग के अनुसार दीपावली मनाता है, वहीं दूसरी ओर सेमरा में सिरदार देव की परंपरा के अनुसार सात दिन पहले ही दीपोत्सव की शुरुआत हो जाती है। यही अनोखी पहचान इस गांव को विशेष बनाती है।

सचमुच, सेमरा में दिवाली की तारीख भले ही पंचांग से अलग हो, लेकिन आस्था की रोशनी सदियों से एक जैसी जल रही है। 🪔

VARDAT NEWS
सच, विश्वास और एक नई सुबह
निष्पक्ष एवं भरोसेमंद पत्रकारिता

Similar Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *