सत्य, दान, दया और इन्द्रियनिग्रह से घर भी बन जाता है तीर्थस्थल
गृहस्थ जीवन की पवित्रता का सनातन संदेश
सनातन धर्म में तीर्थों का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। जब भी तीर्थ का नाम आता है, तो मन में गंगा, यमुना, प्रयागराज, काशी, हरिद्वार, बद्रीनाथ, केदारनाथ और वृंदावन जैसे पवित्र स्थलों की छवि उभर आती है। सामान्यतः यह माना जाता है कि तीर्थस्थलों पर जाकर पूजा, जप, तप, दान और श्राद्ध करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। किंतु हमारे धर्मग्रंथों में एक अत्यंत गूढ़ और प्रेरणादायक संदेश भी दिया गया है कि यदि मनुष्य अपने जीवन में सत्य, दया, दान और इन्द्रियनिग्रह का पालन करता है, तो उसका अपना घर भी तीर्थस्थल बन जाता है।
इसी महान सत्य का वर्णन मत्स्यपुराण के 22वें अध्याय के 80वें श्लोक में मिलता है—
सत्यं तीर्थं दया तीर्थं तीर्थमिन्द्रियनिग्रहः।
वर्णाश्रमाणां गेहेऽपि तीर्थं तु समुदाहृतम्।।
अर्थात् सत्य स्वयं एक तीर्थ है, दया एक तीर्थ है और इन्द्रियों का निग्रह भी तीर्थ है। जो व्यक्ति अपने वर्ण और आश्रम धर्म का पालन करता है, उसका घर भी तीर्थ के समान माना गया है।फिर भी भगवान की कृपा से समाज में आज भी ऐसे श्रद्धालु गृहस्थ और विद्वान आचार्य मिल जाते हैं जो धर्म की ज्योति को प्रज्वलित रखे हुए हैं। वास्तव में ऐसे लोग समाज के लिए अमूल्य रत्न हैं। यही धर्म, संस्कृति और शास्त्रों की रक्षा के आधार स्तंभ हैं।
कलियुग में धर्माचरण की चुनौती
वर्तमान समय कलियुग का समय है। आज समाज में लोभ, तृष्णा, स्वार्थ, परधन की लालसा, कर्तव्यहीनता और विषय-वासना जैसी प्रवृत्तियां तेजी से बढ़ रही हैं। धर्म और अध्यात्म की बातें करने वाले तो बहुत हैं, किंतु वास्तव में श्रद्धा और शास्त्रीय विधि से देवपूजन तथा पितृपूजन करने वाले लोग अत्यंत दुर्लभ होते जा रहे हैं।इसी प्रकार ऐसे विद्वान ब्राह्मणों की भी कमी होती जा रही है जो शास्त्रों के अनुसार कर्मकाण्ड, श्राद्ध और धार्मिक विधानों का यथार्थ ज्ञान रखते हों। दूसरी ओर ऐसे यजमान भी कम ही मिलते हैं जो निष्काम भाव से, बिना किसी दिखावे के धर्मकर्म करना चाहते हों।
तीर्थस्थल का वास्तविक महत्व
शास्त्रों में श्राद्ध, तर्पण और पितृकर्मों के लिए तीर्थस्थलों का विशेष महत्व बताया गया है। नदी तटों, संगमों और पवित्र स्थलों पर किए गए श्राद्ध को अत्यंत पुण्यदायक माना गया है। इसका कारण यह है कि तीर्थों की पवित्रता साधक की छोटी-मोटी कमियों को भी दूर कर देती है।यदि किसी कारणवश पूजा या श्राद्ध में थोड़ी न्यूनता रह जाए, तो भी तीर्थ का प्रभाव उस कमी को काफी हद तक पूर्ण कर देता है। यही कारण है कि धर्मशास्त्र तीर्थों की महिमा का बार-बार वर्णन करते हैं।लेकिन सूतजी यह भी बताते हैं कि यदि कोई व्यक्ति अपने जीवन को शास्त्रानुकूल बना ले, तो उसका घर भी तीर्थ बन सकता है।
वर्ण और आश्रम धर्म का पालन
श्लोक में कहा गया है— वर्णाश्रमाणां गेहेऽपि तीर्थं तु समुदाहृतम्।
यहाँ वर्णाश्रम का अर्थ है कि व्यक्ति अपने जीवन में वर्ण और आश्रम से संबंधित कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करे।
सनातन व्यवस्था में चार वर्ण बताए गए हैं—
- ब्राह्मण
- क्षत्रिय
- वैश्य
- शूद्र
इसी प्रकार चार आश्रम हैं—
- ब्रह्मचर्य
- गृहस्थ
- वानप्रस्थ
- संन्यास
जब कोई व्यक्ति अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करता है, तो उसका जीवन धर्ममय बन जाता है। ऐसे व्यक्ति का घर केवल रहने का स्थान नहीं रहता, बल्कि वह एक आध्यात्मिक केंद्र बन जाता है।
सत्य ही सबसे बड़ा तीर्थ
सूतजी कहते हैं—सत्यं तीर्थम्।
सत्य स्वयं एक तीर्थ है।आज के युग में सत्य बोलना और सत्य का पालन करना आसान नहीं है। अनेक बार स्वार्थ, भय या लालच के कारण लोग असत्य का सहारा ले लेते हैं। लेकिन जो व्यक्ति हर परिस्थिति में सत्य का साथ देता है, उसका जीवन पवित्र बन जाता है।जहाँ सत्य का वास होता है, वहाँ ईश्वर की कृपा स्वतः उपस्थित रहती है। ऐसा घर सत्यतीर्थ कहलाता है।
दया और सेवा से बनता है दयातीर्थ
श्लोक में आगे कहा गया है—दया तीर्थम्।
दया भी एक तीर्थ है।जो गृहस्थ भूखे को भोजन देता है, असहाय की सहायता करता है, अतिथि का सम्मान करता है और जरूरतमंदों की सेवा करता है, उसका घर दयातीर्थ बन जाता है।धर्म केवल मंदिरों में दीप जलाने का नाम नहीं है। वास्तविक धर्म दूसरों के दुःख को समझने और उसे दूर करने का प्रयास करने में है।जहाँ करुणा, सेवा और परोपकार का वातावरण होता है, वहाँ भगवान का निवास माना जाता है।
इन्द्रियनिग्रह का महत्व
शास्त्र कहते हैं—तीर्थमिन्द्रियनिग्रहः।
इन्द्रियों का संयम भी एक महान तीर्थ है।मनुष्य की इन्द्रियाँ उसे विषयों की ओर आकर्षित करती हैं। स्वाद, भोग, क्रोध, लोभ और मोह के वश में होकर व्यक्ति अनेक प्रकार के पापों का भागी बन जाता है।लेकिन जो व्यक्ति अपनी जिह्वा पर नियंत्रण रखता है, संयमित जीवन जीता है और अपनी इच्छाओं को धर्म की मर्यादा में रखता है, वह इन्द्रियनिग्रह का पालन करता है।ऐसे व्यक्ति का घर इन्द्रियनिग्रह तीर्थ कहलाता है।
घर में ही मिल सकता है तीर्थ का फल
मत्स्यपुराण का संदेश अत्यंत स्पष्ट है कि यदि गृहस्थ सत्य, दया, दान, सेवा और इन्द्रियनिग्रह का पालन करता है तथा अपने वर्ण और आश्रम धर्म का पालन करता है, तो उसके घर में किए गए धार्मिक कर्मों को भी तीर्थस्थल में किए गए कर्मों के समान फल प्राप्त होता है।इसका अर्थ यह नहीं कि तीर्थयात्राओं का महत्व कम हो जाता है, बल्कि इसका तात्पर्य यह है कि बाहरी तीर्थ यात्रा के साथ-साथ आंतरिक पवित्रता भी आवश्यक है।आज जब समाज भौतिकता और स्वार्थ की दौड़ में उलझता जा रहा है, तब मत्स्यपुराण का यह संदेश अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है। यदि हम अपने जीवन में सत्य, दया, दान, सेवा, संयम और धर्मपालन को स्थान दें, तो हमारा घर ही तीर्थ बन सकता है।वास्तविक तीर्थ केवल नदी, पर्वत या मंदिर नहीं हैं। सच्चा तीर्थ वह स्थान है जहाँ सत्य का वास हो, दया का प्रवाह हो, इन्द्रियों पर नियंत्रण हो और भगवान के प्रति श्रद्धा हो।ऐसे पवित्र गृहस्थों पर भगवान की कृपा सदैव बनी रहती है और उनका जीवन स्वयं समाज के लिए प्रेरणा बन जाता है।
लेख प्रेरणा स्रोत:आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, वृंदावन धाम
