कालचक्र की प्रतीक्षा और मनुष्य का अहंकार

कालचक्र और अहंकार:

जब कभी जीवन की भागदौड़ से थोड़ा समय निकालकर संसार को ध्यान से देखता हूँ, तो एक प्रश्न बार-बार मन में उठता है—क्या मनुष्य वास्तव में जीना सीख पाया है, या उसने केवल दूसरों पर शासन करना सीख लिया है? ऐसा प्रतीत होता है कि अधिकांश लोग जीवन के वास्तविक उद्देश्य को भूलकर किसी न किसी रूप में अपना वर्चस्व स्थापित करने की दौड़ में लगे हुए हैं।कोई अपने पद के बल पर दूसरों को नियंत्रित करना चाहता है, कोई धन के माध्यम से अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करना चाहता है। कोई जाति, धर्म, परिवार या सामाजिक प्रतिष्ठा का सहारा लेकर स्वयं को बड़ा साबित करने में लगा है, तो कोई ज्ञान और अनुभव के अहंकार में दूसरों को तुच्छ समझता है। मानो इस धरती पर उसका जन्म मनुष्य बनने के लिए नहीं, बल्कि दूसरों को छोटा दिखाने के लिए हुआ हो।सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस शरीर, धन और शक्ति पर मनुष्य इतना गर्व करता है, वह सब अस्थायी है। यह शरीर, जिसकी सुंदरता और सामर्थ्य पर इतना अभिमान किया जाता है, कुछ वर्षों बाद मिट्टी में मिल जाने वाला है। समय का प्रवाह सबसे चमकदार चेहरे की आभा को भी फीका कर देता है। धन, जिसके लिए लोग अपने संबंधों तक की बलि दे देते हैं, वह भी स्थायी नहीं रहता। इतिहास गवाह है कि करोड़ों-अरबों की संपत्ति रखने वाले परिवार भी समय के साथ साधारण हो गए।

जिन महलों, भवनों और संपत्तियों पर लोग अपना नाम अंकित करवाते हैं, वहाँ कई बार उनकी अगली पीढ़ियाँ तक नहीं रह पातीं। जिन कुर्सियों और पदों के लिए लोग अपने सिद्धांतों से समझौता कर लेते हैं, वे कुर्सियाँ भी किसी को अमर नहीं बना सकीं। सत्ता और सामर्थ्य का इतिहास उन लोगों से भरा पड़ा है जो अपने समय में स्वयं को अजेय समझते थे, लेकिन आज वे केवल इतिहास के कुछ पन्नों तक सीमित हैं।फिर भी मनुष्य का अहंकार समाप्त नहीं होता। वह भूल जाता है कि वह प्रकृति का स्वामी नहीं, बल्कि उसकी एक क्षणिक रचना है। जिस धरती पर वह गर्व से चलता है, उसी धरती के नीचे अनगिनत ऐसे लोग विश्राम कर रहे हैं जो कभी उससे कहीं अधिक शक्तिशाली, धनी और प्रभावशाली थे।काल के सामने कभी किसी की नहीं चली। न विशाल साम्राज्य उसे रोक सके, न सोने-चांदी के खजाने, न बड़ी सेनाएँ और न ही चापलूसों की भीड़। काल ने सबको समान रूप से स्वीकार किया है। उसने राजा और रंक, विद्वान और मूर्ख, शक्तिशाली और कमजोर—सभी के साथ एक जैसा व्यवहार किया है।सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि मनुष्य अपनी मृत्यु के सत्य को जानता है। उसे मालूम है कि एक दिन सब कुछ यहीं रह जाएगा। वह जानता है कि उसकी सांसें सीमित हैं। वह यह भी जानता है कि कुछ पीढ़ियों बाद उसका नाम स्मृतियों की धूल में कहीं खो जाएगा। इसके बावजूद वह अपना अधिकांश समय दूसरों को अपमानित करने, डराने, दबाने और अपने अधीन रखने में व्यतीत कर देता है।यही अहंकार का सबसे खतरनाक रूप है।

जब मनुष्य स्वयं को संसार का केंद्र समझने लगता है और बाकी सभी लोगों को अपने उपयोग की वस्तु मानने लगता है, तब उसका पतन प्रारंभ हो जाता है। जब उसे लगने लगता है कि उसका पद ही उसका व्यक्तित्व है, उसका धन ही उसका चरित्र है और उसकी शक्ति ही उसका धर्म है, तब उसके भीतर का मनुष्य धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है।अहंकार सबसे पहले करुणा को मारता है। फिर संवेदना को सुखा देता है। उसके बाद विवेक को अंधा कर देता है। परिणामस्वरूप जीवन में वर्चस्व का ऐसा खेल शुरू होता है जिसमें सम्मान की जगह भय ले लेता है, प्रेम की जगह उपयोगिता और संबंधों की जगह स्वार्थ।ऐसे वातावरण में मनुष्यता पीछे छूट जाती है और केवल अहंकार बचता है।लेकिन इतिहास और प्रकृति का एक अटल नियम है जिसे आज तक कोई बदल नहीं पाया है। कालचक्र कभी जल्दबाजी नहीं करता, परंतु कभी भूलता भी नहीं। वह हर अपमान को दर्ज करता है, हर अन्याय को याद रखता है, हर छल और हर झूठी श्रेष्ठता को अपने खाते में लिखता रहता है।उसकी लेखनी में स्याही नहीं होती, बल्कि परिणाम लिखे जाते हैं।और जब उसका समय आता है, तब वह न कोई चेतावनी देता है और न कोई घोषणा करता है। अचानक परिस्थितियाँ बदल जाती हैं। सत्ता बदल जाती है। कुर्सियाँ बदल जाती हैं। संबोधन बदल जाते हैं। भीड़ बदल जाती है। तालियाँ बजाने वाले लोग बदल जाते हैं।जो व्यक्ति कभी स्वयं को अजेय समझता था, वह एक दिन अपने ही बनाए हुए अकेलेपन में खड़ा दिखाई देता है।

कालचक्र और अहंकार:

इसलिए जीवन में यदि शक्ति मिले तो उसे सेवा का माध्यम बनाइए, प्रदर्शन का नहीं। यदि धन मिले तो उसे लोककल्याण का साधन बनाइए, अहंकार का कारण नहीं। यदि ज्ञान मिले तो उसे दूसरों को ऊपर उठाने के लिए उपयोग कीजिए, उन्हें नीचा दिखाने के लिए नहीं। यदि पद मिले तो उसे जिम्मेदारी समझिए, अधिकार नहीं।वास्तव में महान वही है जो अपनी शक्ति के बावजूद विनम्र बना रहे। जो दूसरों का सम्मान करना जानता हो। जो अपने प्रभाव का उपयोग संरक्षण के लिए करे, शोषण के लिए नहीं। जो लोगों को जोड़ने का प्रयास करे, तोड़ने का नहीं।

जीवन एक यात्रा है और हम सभी यात्री हैं। यात्री का धर्म रास्ते को सुंदर बनाना है, उस पर अधिकार जताना नहीं। लेकिन दुर्भाग्य से अधिकांश लोग इस अस्थायी सराय को ही अपना स्थायी घर समझ बैठते हैं और फिर उसी भ्रम में जीते रहते हैं।यदि मनुष्य यह समझ ले कि उसका अस्तित्व क्षणभंगुर है, तो उसका व्यवहार भी बदल जाएगा। वह दूसरों को नीचा दिखाने के बजाय उन्हें सम्मान देना सीखेगा। वह शासन करने के बजाय सहयोग करना सीखेगा। वह वर्चस्व स्थापित करने के बजाय संबंध बनाना सीखेगा।अंततः यही जीवन का सार है।

अहंकार चाहे जितना बड़ा हो जाए, कालचक्र उससे बड़ा होता है। इसलिए जो लोग आज शक्ति, पद, धन और प्रभाव के नशे में डूबे हुए हैं, उन्हें यह बात कभी नहीं भूलनी चाहिए कि वे किसी से बड़े नहीं हैं। वे केवल कुछ समय के लिए अधिक शक्तिशाली हैं। उन्हें केवल थोड़े समय के लिए अवसर मिला है।वे मालिक नहीं, केवल यात्री हैंऔर यात्रियों का सबसे बड़ा भ्रम यही होता है कि वे सराय को अपना स्थायी घर समझ बैठते हैं।

कालचक्र शांत है, लेकिन निष्क्रिय नहीं। वह देख रहा है, सुन रहा है, सब कुछ दर्ज कर रहा है और उचित समय की प्रतीक्षा कर रहा है। इसलिए जीवन में यदि कुछ संजोना है तो अहंकार नहीं, विनम्रता संजोइए; वर्चस्व नहीं, मानवता संजोइए; शक्ति नहीं, संवेदना संजोइए।क्योंकि अंत में वही याद रखा जाएगा जिसने लोगों के दिलों में स्थान बनाया, न कि जिसने लोगों पर शासन किया।