वर्तमान में सुन्दरकाण्ड का बिगड़ता स्वरूप

भारतीय सनातन परंपरा में रामचरितमानस का सुन्दरकाण्ड केवल एक धार्मिक पाठ नहीं, बल्कि श्रद्धा, भक्ति, साहस, सेवा, प्रबंधन, आत्मविश्वास और आध्यात्मिक ऊर्जा का अद्भुत स्रोत माना जाता है। सदियों से श्रद्धालु संकटों के निवारण, मानसिक शांति, आत्मबल और भगवान श्रीराम तथा श्रीहनुमान जी की कृपा प्राप्ति के लिए सुन्दरकाण्ड का पाठ करते आए हैं। किंतु वर्तमान समय में जिस प्रकार सुन्दरकाण्ड के आयोजन हो रहे हैं, उन्हें देखकर अनेक श्रद्धालुओं और विद्वानों के मन में चिंता उत्पन्न होना स्वाभाविक है।आज सुन्दरकाण्ड का मूल उद्देश्य कहीं न कहीं पीछे छूटता दिखाई दे रहा है और उसका स्थान बाहरी दिखावे तथा मनोरंजन ने लेना शुरू कर दिया है। यह स्थिति केवल एक धार्मिक परंपरा के परिवर्तन का प्रश्न नहीं है, बल्कि हमारी सांस्कृतिक चेतना और धार्मिक दृष्टिकोण पर भी गंभीर विचार करने का विषय है।

“ऐसा सुन्दरकाण्ड करना कि मज़ा आ जाए”

आजकल किसी भी सुन्दरकाण्ड आयोजन की बुकिंग पहले से हो जाती है। इसके बाद आयोजकों के फोन आने लगते हैं—“पंडित जी, ऐसा सुन्दरकाण्ड करना कि माहौल बन जाए।”“पहले हम दूसरी मंडली बुलाते थे, लेकिन आपके बारे में बहुत सुना है, इसलिए कुछ ऐसा होना चाहिए कि लोग झूम उठें।”इन वाक्यों को सुनकर सहज ही प्रश्न उठता है कि क्या सुन्दरकाण्ड का उद्देश्य लोगों को झुमाना है या भगवान श्रीराम और श्रीहनुमान के चरित्र का स्मरण कराना?दुर्भाग्य से आज अनेक स्थानों पर सुन्दरकाण्ड की सफलता का मापदंड यह बन गया है कि कितना तेज संगीत बजा, कितने लोग नाचे और कितना मनोरंजन हुआ। चौपाइयों और दोहों की आध्यात्मिक गहराई की अपेक्षा वाद्ययंत्रों की ध्वनि और मंचीय प्रदर्शन को अधिक महत्व मिलने लगा है।

सुन्दरकाण्ड : आध्यात्मिक शक्ति का भंडार

सुन्दरकाण्ड का प्रत्येक प्रसंग जीवन को दिशा देने वाला है। इसमें श्रीहनुमान जी की निष्ठा, समर्पण, साहस, विनम्रता, बुद्धिमत्ता और कर्तव्यपरायणता का अनुपम चित्रण मिलता है।समुद्र लांघना हमें असंभव प्रतीत होने वाले कार्यों को करने की प्रेरणा देता है।सुरसा प्रसंग बुद्धि और धैर्य का संदेश देता है।लंका प्रवेश रणनीति और प्रबंधन का पाठ पढ़ाता है।सीता माता की खोज धैर्य और लक्ष्य के प्रति समर्पण का उदाहरण है।लंका दहन अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस सिखाता है।ऐसा अद्भुत ग्रंथ, जो जीवन के हर क्षेत्र के लिए प्रेरणा देता हो, यदि केवल मनोरंजन का माध्यम बनकर रह जाए तो यह निश्चित रूप से चिंता का विषय है।

भक्ति की जगह प्रदर्शन

वर्तमान समय में अनेक स्थानों पर सुन्दरकाण्ड के दौरान श्रद्धा की अपेक्षा प्रदर्शन अधिक दिखाई देता है। विशाल मंच, अत्यधिक ध्वनि विस्तारक यंत्र, फिल्मी धुनों से प्रेरित प्रस्तुतियां और तालियों की प्रतिस्पर्धा जैसे दृश्य आम होते जा रहे हैं।लोगों का ध्यान चौपाइयों के अर्थ और संदेश पर कम तथा संगीत की लय पर अधिक केंद्रित रहता है। कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि कोई सांस्कृतिक मनोरंजन कार्यक्रम चल रहा हो।भक्ति का मूल तत्व मन की एकाग्रता है। जब मन भगवान के स्मरण से हटकर बाहरी आकर्षणों में उलझ जाता है, तब पाठ का आध्यात्मिक प्रभाव स्वतः कम हो जाता है।

पाठ के दौरान अनुशासन का अभाव

एक और चिंताजनक प्रवृत्ति यह देखने में आती है कि सुन्दरकाण्ड के दौरान अनेक लोग पूर्ण श्रद्धा और अनुशासन का पालन नहीं करते।कहीं लोग गुटखा या तंबाकू का सेवन करते हुए पाठ में बैठे दिखाई देते हैं। कहीं बीच-बीच में चाय, शरबत और नाश्ते का दौर चलता रहता है। आयोजक भी अतिथियों के सत्कार के नाम पर लगातार खान-पान की व्यवस्था करते रहते हैं।निस्संदेह अतिथि सत्कार भारतीय संस्कृति का महत्वपूर्ण अंग है, किंतु धार्मिक अनुष्ठान के दौरान उसका स्वरूप मर्यादित होना चाहिए। सुन्दरकाण्ड पाठ के समय मन, वचन और शरीर की पवित्रता अपेक्षित मानी गई है। एक आसन पर स्थिर होकर, एकाग्र मन से, श्रद्धापूर्वक पाठ करना अधिक उचित माना जाता है।यदि बीच-बीच में उठना-बैठना, बातचीत करना और खान-पान चलता रहे तो पाठ की गंभीरता प्रभावित होती है।

अखण्ड सुन्दरकाण्ड का खंडित स्वरूप

कुछ दशक पहले तक अधिकांश स्थानों पर अखण्ड सुन्दरकाण्ड का आयोजन होता था। इसमें चौपाइयों और दोहों का क्रम बिना बाधा के चलता रहता था। संगीत और धुनें भी होती थीं, लेकिन उनका उद्देश्य पाठ को प्रभावशाली बनाना होता था, न कि उसे रोकना।आज स्थिति बदलती जा रही है। अनेक आयोजनों में कुछ चौपाइयों के बाद लंबे-लंबे भजन गाए जाते हैं। फिर कुछ देर बाद पुनः सुन्दरकाण्ड आरंभ होता है। कई बार भजनों का समय सुन्दरकाण्ड से भी अधिक हो जाता है।प्रश्न यह है कि यदि भजन-कीर्तन ही प्रमुख उद्देश्य है, तो उसके लिए अलग से भजन संध्या या कीर्तन कार्यक्रम आयोजित किया जा सकता है। सुन्दरकाण्ड के पूर्व या उसके पूर्ण होने के बाद इच्छानुसार भजन गाए जा सकते हैं। लेकिन सुन्दरकाण्ड के बीच-बीच में बार-बार रुकावट डालना उसके अखण्ड स्वरूप को खंडित कर देता है।वास्तव में रामचरितमानस की चौपाइयाँ और दोहे स्वयं में भक्ति गीत ही हैं। उनमें इतनी भावपूर्ण भक्ति और काव्य सौंदर्य निहित है कि अलग से मनोरंजन जोड़ने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती।

फल क्यों नहीं मिलता?

अक्सर लोग कहते हैं कि उन्होंने कई बार सुन्दरकाण्ड कराया, फिर भी अपेक्षित लाभ नहीं मिला। इसका एक कारण हमारे भाव में कमी भी हो सकती है।धार्मिक ग्रंथों में बार-बार कहा गया है कि किसी भी पूजा, पाठ या अनुष्ठान का फल केवल कर्मकांड से नहीं, बल्कि श्रद्धा और भाव से प्राप्त होता है।यदि हमारा ध्यान भगवान के स्मरण की अपेक्षा सामाजिक प्रदर्शन, मनोरंजन या आयोजन की भव्यता पर अधिक रहेगा, तो पाठ का आध्यात्मिक प्रभाव कम होना स्वाभाविक है।सुन्दरकाण्ड का वास्तविक फल तब मिलता है जब व्यक्ति श्रीहनुमान जी के चरित्र को आत्मसात करने का प्रयास करता है—उनकी सेवा भावना, विनम्रता, निष्ठा और समर्पण को अपने जीवन में उतारता है।

संस्कृति संरक्षण की आवश्यकता

आज हम अक्सर कहते हैं कि हमें अपनी संस्कृति और धर्म को बचाना है। किंतु संस्कृति केवल बड़े आयोजनों, झंडों और नारों से सुरक्षित नहीं होती। वह तब सुरक्षित रहती है जब हम उसकी मूल भावना को समझते और उसका सम्मान करते हैं।यदि धार्मिक परंपराएं केवल मनोरंजन का माध्यम बन जाएं, तो धीरे-धीरे उनका आध्यात्मिक आधार कमजोर होने लगता है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि हम सुन्दरकाण्ड को उसके वास्तविक स्वरूप में समझें और प्रस्तुत करें।

सुन्दरकाण्ड कोई साधारण पाठ नहीं है। यह श्रीहनुमान जी के अद्भुत चरित्र का दिव्य वर्णन है, जो मनुष्य को साहस, आत्मविश्वास, भक्ति और जीवन प्रबंधन की प्रेरणा देता है। इसे मनोरंजन, प्रदर्शन या सामाजिक प्रतिष्ठा का साधन बनाना उसकी गरिमा को कम करता है।समय की मांग है कि हम सुन्दरकाण्ड के मूल स्वरूप को पुनः स्थापित करें। श्रद्धा, अनुशासन, एकाग्रता और भक्ति के साथ इसका पाठ करें। भजनों, संगीत और अन्य कार्यक्रमों का अपना स्थान हो सकता है, किंतु सुन्दरकाण्ड की अखण्डता और पवित्रता बनी रहनी चाहिए।जब हम सुन्दरकाण्ड को केवल सुनेंगे नहीं, बल्कि उसके संदेश को जीवन में उतारेंगे, तभी वास्तव में श्रीहनुमान जी की कृपा और इस महान काव्य का वास्तविक फल प्राप्त कर सकेंगे। यही हमारी संस्कृति, धर्म और आध्यात्मिक परंपरा के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।